Tuesday, May 14, 2013

ARTI KA MAHATV

 पूजन में आरती का बहुत महत्व है ,ऐसा मन जाता है की अगर पूजन में कोई भी त्रुटि  हो जाय तो आरती से उसकी पूर्ति हो जाती है ,स्कन्दपुराण में बताया गया है ------
पूजन मन्त्रहीन और क्रियाहीन होने पर भी नीराजन(आरती ) कर लेने से उसमें सारी पूर्णता आ जाती है .
आरती में सबसे पहले भगवन को पुष्पांजली देनी चाहिए ,घंटे की ध्वनि से तथा जयकार के शब्द के साथ कपूर या दिए से आरती करनी चाहिए .
असल में आरती पूजन के अंत में इष्टदेवता की प्रसन्नता हेतु की जाती है । आरती के पांच अंग मने गए है .
१. दीपमाला ,२ जलयुक्त शंख से ,३. धुले वस्त्र से .४. आम और पीपल के पट्टों से .और ५. साष्टांग दण्डवत से ।
आरती घी में डूबी पाँच बत्तियों से की जानी चाहिए .
आरती मुख पर एक बार ,नाभि पर दो बार ,एवम चरणों में चार बार की जानी चाहिए और सम्पूर्ण अंग पर सात बार की जानी चाहिए  । अक्सर हम सब एक -एक कर के आरती करते हैं जबकि ऐसा मन गया है की आरती एक ही व्यक्ति को पूरी करनी चाहिए ।
सांध्य आरती का नियम जरूर होना चाहिए । आरती  सब परिवार के साथ यदि की जाय तो उत्तम मानी गयी है .इष्टदेव को आरती दिखने के बाद स्तवन और गुणगान करना चाहिए -------

कदलीगर्भ कर्पूरम च प्रदीपितं । आरार्तिक्यम्हम कुर्वे पश्य मे वरदो भव ॥ 

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