Sunday, September 15, 2013

vaman ekadashi

भाद्र पक्ष की शुक्ल एकादशी को वामन एकादशी कहा जाता है और इसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है।  इस एकादशी में वामन  की पूजा का विधान है । भगवान् विष्णु अपनी शयन वेदिका पर करवट बदलते रहते हैं और इसीलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहा जाता है ।

कथा -------

त्रेता युग में प्रहलाद के पौत्र राजा बलि राज्य करता था ,ब्राह्मणों का सेवक था और भगवान् विष्णु का परम भक्त था । मगर इन्द्रादि देवताओं का शत्रु था । अपने भुज बल से देवताओं को विजय करके स्वर्ग से निकाल दिया था । देवताओं को दुखी देखकर भगवन विष्णु में वामन का स्वरुप धारण किया और राजा  बलि के द्वार पर आकर खड़े हो गए और कहा मुझे तीन पग प्रथ्वी का दान चाहिए , बलि बोले --"तीन पग क्या मैं तीन लोक दान कर सकता हूँ " 
भगवान् ने विराट रूप धारण किया ,२ लोकों को २ पग में ले लिए ,तीसरा पग राजा बलि के सर पर रखा जिसके कारण पातळ लोक चले गए । 
जब भगवान् वामन पैर उठाने लगे तब बलि ने उनके चरणों को पकड़कर कहा इन्हें मैं मंदिर में रखूंगा । 
तब भगवान् बोले -"यदि तुम वामन एकादशी का व्रत करोगे तो में तुम्हारे द्वार पर कुटिया बनाकर रहूँगा। "
राजा बलि एकादशी का व्रत विधिपूर्वक किया और कहा जता है की तभी से भगवान् की एक प्रतिमा पातळ लोक में द्वारपाल बनकर निवास करने लगी और एक प्रतिमा छीर सागर में निवास करने लगी । 

इस दिन वामन भगवान् की मूर्ती की पूजा करनी चाहिए और ककड़ी का सागार लिया जाना चाहिए ।


Monday, September 9, 2013

bhajan

                     मोहन हमारे मधुबन में तुम आया न करो -तुम आया न करो ---------

                                           जादू भरी ये बांसुरी बजाया न करो -बजाया  न करो -------------

१. सूरत तुम्हारी देख कर सलोनी सांवली -सलोनी सांवली -२ 

                                                      सुन बांसुरी की तान मैं हो गयी बाँवरी -२ 

                                                               माखन चुराने वाले ,दिल चुराया न करो - चुराया न करो -----

                                   मोहन हमारे मधुबन में तुम आया न करो ----

२. माथे मुकुट गलमाल कटि में काछनी सोहे -काछनी सोहे -२ 

                                                     कानों में कुंडल झूमते मन को मेरे सोहे - मन को मेरे सोहे -२ 

                                                         इस चन्द्रमा के रूप से लुभाया न करो ----

                               मोहन हमारे मधुबन में तुम आया न करो … 

३. अपनी यशोदा मात की सौगंध है तुमको -सौगंध है तोहे -२ 

                                                     यमुना नदी के तीर पर तुम न मिलो हमको - तुम न मिलो हमको -२ 

                                                        इस बांसुरी की तान पे बिल्माया न करो ---

                                मोहन हमारे मधुबन में तुम आया न करो …… 

४. इसी तुम्हारी बांसुरी ने मोहनी डारी -मोहनी डारी  -२ 

                                                      चन्द्र सखी की विनती तुम सुन लो बनवारी -सुन लो बनवारी -२ 

                                                           दर्शन दिखा दो साँवरे अब देर न करो -अब देर न करो ----

                                  मोहन हमारे मधुबन में तुम आया न करो -------

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Thursday, September 5, 2013

ganesh chaturthi



भाद्र पक्ष की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का आयोजन धूमधाम से किया जाता है, और  इसे विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है  गणेशजी का वाहन मूषक है , इनको बुद्धि का देवत माना जाता है । इनकी पत्नी रिद्धि और सिद्धि हैं । और गणेश जी का प्रिय भग मोदक है जो चावल के आटे से बनाया जाता है और जिसमें नारियल और गुड़ डाला जाता है । चतुर्थी के दिन गणेश जी की स्थापना करने के बाद सभी लोग अपनी सुविधा के अनुसार रखते हैं ,और फिर १० दिनों के बाद विसर्जन किया जाता है । 
महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है । 
कैसे करें पूजन ,स्थापना और विसर्जन -------         

  • गणेशोत्सव के दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर सोने, तांबे, मिट्टी अथवा गोबर  गणेशजी की प्रतिमा बनाई जाती है। गणेशजी की इस प्रतिमा को कोरे कलश में जल भरकर, मुंह पर कोरा कपड़ा बांधकर उस पर स्थापित किया जाता है। फिर मूर्ति पर (गणेशजी की) सिंदूर चढ़ाकरपूजन करना चाहिए ।
  • पूजन के समय अपना मुंह उत्तर या पूर्व की और रखना चाहिए । 
  • पूजन में पुष्प ,धूप के पश्चात :ॐ गण गणपतये नमः"मन्त्र से माला का जप करना चाहिए । 
  • पूजन में तिल ,गुड़ से बनी चीज़ों का भोग लगाना चाहिए ,गणेशजी को मोदक सर्वप्रिय है । 
  • अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करना चाहिए ।                       
  •  कथा ------------

                    
    पौराणिक गणेश कथा के अनुसार एक बार देवता कई विपदाओं में घिरे थे। तब वह मदद मांगने भगवान शिव के पास आए। उस समय शिव के साथ कार्तिकेय तथा गणेशजी भी बैठे थे।
    देवताओं की बात सुनकर शिवजी ने कार्तिकेय व गणेशजी से पूछा कि तुममें से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय व गणेशजी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की मदद करने जाएगा।
       

    भगवान शिव से यह सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए। परंतु गणेशजी सोच में पड़ गए कि वह चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा कैसे करेंगे ,इस तरह से तो बहुत समय लग जाएगा।
    उन्हें एक उपाय सूझा। गणेश अपने स्थान से उठें और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करके वापस बैठ गए। परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजेता बताने लगे। तब शिवजी ने श्रीगणेश से पृथ्वी की परिक्रमा ना करने का कारण पूछा।

    तब गणेश ने कहा - 'माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं।' 
    यह सुनते ही भगवान शिव ने गणेशजी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी। इस प्रकार भगवान शिव ने गणेशजी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा उसके तीनों ताप यानी दैहिक ताप, दैविक ताप तथा भौतिक ताप दूर होंगे। 


  •  जिस भी दिन विसर्जन किया जाना हो पूजन ,वंदन करके कलश और थाल के साथ गणेश जी की प्रतिमा को बंधू जनों के साथ जाकर किसी नदी या तालाब में जाकर विसर्जित करना चाहिए । 

bhajan


                          हरी नाम का दीवाना  बन कर देखो ,कोई प्रेम का प्याला पी कर देखो …। 

 


         १. हुई दीवानी मीराबाई -हुई दीवानी मीराबाई 

                                           पाए कष्ट लाखों नहीं पछताई --२ 

              विष से बन गया अमृत देखो  -----। 

          २. शबरी के घर राम जी आये -शबरी के घर राम जी आये . 

                                          खाए बेर और बहुत सिहाये -२ 

                कहा लक्ष्मण से चख कर देखो -----। 

           ३ . इस भक्ति का नशा है छाया -इस भक्ति का नशा है छाया . 

                                           जो कोई पीये होए मतवाला -२ 

               इस भक्ति के रस पी के देखो …।                                  --

Tuesday, September 3, 2013

upasna

  1. पूजा के लिए स्थान पवित्र ,और स्वछ होना चाहिए . पूजा मूर्ति या चित्र के समक्ष करना चाहिए । 
  2. हनुमान जी को सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए। 
  3. विष्णु जी को अक्षत नहीं चढाने चाहिये ।  
  4. गणेश जी को तुलसी पत्र नहीं चढ़ाना चाहिए । 
  5. दुर्गा जी को दूर्वा नहीं चढ़ानी चाहिए । 
  6. शंकर जी को मदार का पुष्प चढ़ाना चाहिए । 
  7. बेल पत्र खंडित नहीं होना चाहिए . 
  8. बेलपत्र ४० दिनों तक के पुराने भी चढ़ाएं जा सकते हैं । 
  9. कीड़ों के खाए हुए पुष्प नहीं चढाने चाहिए । 
  10. गणपति को दूर्वा और लाल पुष्प चढाने चाहिए ।