Wednesday, November 27, 2013

utpanna ekadashi

पूजा -पाठ हिदुस्तानी घरों की परम्परा है प्रतिदिन के व्रत -त्यौहार दिनचर्या में उसी तरह से शामिल हैं जिस तरह से भोजन। एकादशी ,तेरस ,पूर्णिमा,आदि के व्रत  की परंपरा है ,कहा जाता है एकादशी के व्रत के रखने से विष्णु जी की कृपा के साथ ही मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। आने वाली २९ नवम्बर २०१३ को उत्पन्न एकादशी पड़ रही है और जिसकी कथा और पूजा इस प्रकार है --------
 इस व्रत को करने से मनुष्य का जीवन शुख शांति से व्यतीत होता है ,इस दिन परोपकारिणी देवी का जन्म हुआ था और इसीलिए इस दिन पूजन करके भगवद भजन करना चाहिए।

कथा-----

          सतयुग में मुर नामक दानव ने देवताओं पर विजय पाकर इंद्र को पदस्थ कर दिया ,देवता लोग अप्रसन्न होकर भगवान् शंकर के पास पहुंचे ,शिवजी के आदेश से देवता विष्णु जी के पास पहुचे। विष्णु जी ने बाणों से राक्षसों का वध तो कर दिया मगर मुर न मरा। दानव मुर किसी देवता के वरदान से अजेय था। विष्णु जी ने मुर से लड़ना छोड़कर बद्रिकाश्रम की गुफा में आराम करने चले गए। मुर ने भी उनका पीछा न छोड़ा और गुफा में जाकर उन्हें मारना चाहा ,पर उसी समय विष्णु जी के शरीर से एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया ,जिसने मुर का वध कर दिया। 
उस कन्या ने विष्णु जी को बताया -:मैं आपके अंग से उत्पन्न हुई एक शक्ति हूँ। "विष्णु जी प्रसन्न हुए और उन्होंने वरदान दिया कि तुम संसार के माया जाल में उलझे तथा मोहवश मुझे भूले हुए प्राणियों को मेरे पास लाने में सक्षम होगी और तेरी आराधना करने वाले प्राणी आजीवन सुखी रहेंगे। 
क्योंकि वो कन्या एकादशी के दिन पैदा हुई थी अतः इस एकादशी का नाम उत्पन्न पड़ा ,और इस एकादशी को करने वाले प्राणी को विष्णु लोक में वास मिलता है। 

Sunday, November 24, 2013

bhajan

 

 

          राम नाम के साबुन से मन का मैल छुड़ाएगा ,निर्मल मन के दर्पण में वो राम का दर्शन पायेगा॥ 

   १. हर प्राणी में राम बसे हैं ,पल भर तुमसे दूर नहीं -२ देख सके न जिन आँखों से उन आँखों में नूर नहीं ॥ 

                       देखेगा मन मंदिर में वो प्रेम की जोत जलायेगा -निर्मल मन -------

  २. नर शरीर अनमोल है ,प्राणी हरि कृपा से पाया है -२ झूठे जग प्रपंच में पड़कर क्यों हरि को बिसराया है ॥ 

                    समय हाथ से निकल गया तो फिर धुन -धुन पछतायेगा --निर्मल मन -----

३.साधन तेरा कच्चा है जब तक प्रभु पर विशवास नहीं -२ मंजिल को पाना है क्या जब दीपक में प्रकाश नहीं ॥ 

                 राम नाम एक मन्त्र यही प्रिय साथ तुम्हारे जाना है -निर्मल मन------

Friday, November 22, 2013

bhajan

   मुखड़ा ---

बन के लिलहरी राधा को चलने चले ,भेष उनका बनाना गजब हो गया ,जुल्म ढाती थी जो चोटियां श्याम की ,मन सेंदुरा भराना गजब हो गया। …।

अंतरा ---

            १. आसमां पर सितारे लरजने लगे ,चाँद बदली में मूहं को छुपाने लगा -----२ 

                   चांदनी रात में बेखदर बाम पर बेनकाब उनका आना  गजब हो गया  -----बन के लिलहरी ----

          २. बिछड़ी जिस दम मिली थी नज़र से नज़र ,जान राधा गयीं छल किया आनकर ----२ 

                    बहुत शर्मिंदा थीं राधिका उस घड़ी ,श्याम का मुस्कुराना गजब हो गया --- बन के लिलहरी ----

          ३. हाथ गालों पे जिस दम धारा श्याम ने ,हाथ झलकार राधा ये कहने लगीं ---२ 

                    सच बता दे अरे छलिया तू कौन है ,तुझसे नज़रें मिलाना गजब हो गया ------बन के लिलहरी----

          ४. तेरा प्रेमी हूँ अच्छी तरह जान ले ,मैं हूँ छलिया किशन मुझको पहचान ------२ 

                   तेरी खातिर मैं राधा जनाना बना ,प्रेम तुमसे बढ़ाना गजब हो गया --बन के लिलहरी  -----

Sunday, November 17, 2013

bhajan

                            रामा -रामा रटते -रटते बीती रे उमरिया,रामा -रामा रटते -रटते बीती रे उमरिया,

                              कब आओगे रघुकुल नंदन दासी की झोपड़िया।,रामा-रामा 

     १.  मैं शबरी भीलनी की जायी भजन भाव न जानूं रे ,भजन भाव ना जानूं  रे . 

                        राम तेरे दर्शन की खातिर वन में जीवन पालूं रे -वन में जीवन पालूं  रे -

                             चरण कमल से निर्मल कर दो दासी की झोपड़िया ,,रामा -रामा---

     २. रोज सवेरे वन में जाकर फल चुन-चुन कर लाऊंगी -फल चुन कर लाऊंगी -

                       अपने प्रभु के सन्मुख रखकर प्रेम से भोग लगाउंगी -प्रेम से भोग लगाउंगी ,

                            मीठे -मीठे बेरन की मैं भर लायी डलईया ,रामा -रामा ---

     ३. श्याम सलोनी मोहनी मूरत नैना बीच बसाऊंगी ,नैना बीच बसाऊंगी ,

                      पद पंकज की रज धर मस्तक जीवन सफल बनाउंगी ,जीवन सफल बनाउंगी ,

                            अब क्या प्रभु जी भूल गए हो दासी की डगरिया ,रामा -रामा --

       ४. नाथ तेरे दर्शन की प्यासी मैं अबला एक नारी हूँ ,मैं अबला एक नारी हूँ ,

                      दर्शन बिन दो नैना तड़पे ,सुनो बहुत दुखारी हूँ ,सुनो बहुत दुखारी हूँ। 

                             हीरा रूप में दर्शन दे दो डालो एक नजरिया-- ऱामा -रामा



Wednesday, November 13, 2013

kartik poornima/ कार्तिक पूर्णिमा / 25 November 2015

कार्तिक पूर्णिमा का हिन्दू धर्म में बहुत महत्त्व है.पुराणों में मान्यता है कि आज के दिन शिव जी ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध किया था अतः अगर इस दिन कृतिका नक्षत्र हो तो इस पूर्णिमा को त्रिपुरी पूर्णिमा कहते हैं और इस दिन इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है।
वर्ष २०१५ में २५ नवम्बर को यह पूर्णिमा पड़ेगी -
मत्स्यपुराण के अनुसार इस दिन भगवान् विष्णु ने  प्रलय काल में वेदों की रक्षा करने के लिए मत्स्य अवतार लिया था .इस  दिन दान -स्नान तथा दीप दान का विशेष महत्त्व है।
इस दिन चंद्रोदय पर शिवा ,सम्भूति।,संतति ,प्रीती ,अनुसूया ,और क्षमा इन छः कृतिकाओं का पूजन और वृष दान से शिवपद की प्राप्ति होती है।
शास्त्रों में वर्णित है कि कार्तिक पुर्णिमा  के दिन पवित्र नदी व सरोवर एवं धर्म स्थान में जैसे, गंगा, यमुना, पुष्कर, गोदावरी, नर्मदा, गंडक, कुरूक्षेत्र, अयोध्या, काशी में स्नान करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है. महर्षि अंगिरा ने स्नान के प्रसंग में लिखा है कि यदि स्नान में कुशा और दान करते समय हाथ में जल व जप करते समय संख्या का संकल्प नहीं किया जाए तो कर्म फल की प्राप्ति नहीं होती है.

कथा ---

एक बार त्रिपुर राक्षस ने एक लाख वर्ष तक प्रयागराज में घोर तप किया ,इस तप से  समस्त जड़ ,चेतन ,जीव तथा देवता भयभीत हो गए। देवताओं ने तप भंग करने के लिए अप्सराएं भेजीं पर उन्हें भी सफलता नहीं मिली। ब्रह्मा जी ने उसे वरदान दिया था कि वह देवता से मरे और न ही मनुष्य से।
और इस वरदान के कारण त्रिपरसुर ने निडर हो अत्याचार करना शुरू कर दिया तब महादेव तथा त्रिपुरासुर का घमासान युद्ध हुआ, अंत में शिव जी ने विष्णु जी  की सहायता से उसका अंत कर दिया !तभी से इस दिन का महत्त्व बढ़ गया और इस दिन को दीपावली से ही सामान मनाया जाता है।
 कार्तिक पूर्णिमा का दिन सिख सम्प्रदाय के लोगों के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन सिख सम्प्रदाय के संस्थापक गुरू नानक देव का जन्म हुआ था. सिख सम्प्रदाय को मानने वाले  पूरे कार्तिक माह में सुबह स्नान कर गुरूद्वारों में जाकर गुरूवाणी सुनते हैं और नानक जी के बताये रास्ते पर चलने की सगंध लेते हैं.तथा प्रभात फेरियां करते हैं। इस दिन कढ़ाव प्रसाद बना कर वितरित करते हैं।
कार्तिक माह में रामायण का अध्धययन करने से बहुत पुण्य प्राप्त होता है। कुछ लोग पूरे कार्तिक में कार्तिक महात्म्य कि पुस्तक का पाठ करते हैं।
पूरे कार्तिक मास में तुलसी पूजन का विशेष महत्त्व  है, तुलसी पर दीप जलना, तुलसी विवाह आदि की परम्परा बहुत पुरानी है, एकादशी से पूर्णिमा तक किसी भी दिन तुलसी विवाह किया जाता है, परन्तु अधिकतर घरों व् मंदिरों में प्रबोधिनी एकादशी के दिन तुलसी विवाह का आयोजन बड़ी धूमधाम से किया जाता है।

Sunday, November 10, 2013

prabhodhini ekadashi/ प्रबोधनी एकादशी/ देवोत्थानी एकादशी/ दिनांक २२ नवम्बर २०१५

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकाद्शी या देव उठावनी एकादशी के नाम से जाना जाता है. कुछ स्थानों में इसे प्रबोधनी एकाद्शी भी कहा जाता है.
 कहा ये जाता है कि भाद्रपक्ष की एकादशी को भगवान् विष्णु ने शंखासुर नामक राक्षस का वध किया और क्षीर सागर में थकावट के कारण शयन करने चले गए और प्रबोधनी एकादशी को चार माह के पश्चात  विश्राम समाप्त किया, तभी से चौमास प्राम्भ होता है. देवउठावनी एकादशी के दिन भगवन विष्णु शयन से उठते हैं अतः इस लिए इसे देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं।
इस तिथि के बाद ही शादी-विवाह आदि के शुभ कार्य शुरु होते है. वर्ष २०१५   में यह एकादशी दिनांक २२ नवम्बर को पड़ेगी

प्रबोधनी एकादशी के विषय में कहा गया है,कि समस्त तीर्थों में जाने था, गौ, स्वर्ण, भूमि आदि के दान का फल और कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रबोधनी एकादशी के रात्रि के जागरण के फल एक बराबर होते है. इस संसार में उसी का जीवन सफल है, जिसने प्रबोधनी एकादशी का व्रत किया है. संसार में जितने तीर्थ स्थान है, वे सभी एकत्र होकर इस एकादशी को करने वाले व्यक्ति के घर में होते है. देवोत्थानी एकादशी करने से व्यक्ति धनवान, योगी, तपस्वी तथा इन्द्रियों को जीतने वाला बनता है. इस व्रत को करने से व्यक्ति भगवान श्री विष्णु का प्रिय बन जाता है.

इस दिन तुलसी विवाह भी किया जाता है,कहा जाता है कि कार्तिक मास मे जो मनुष्य तुलसी का विवाह भगवान से करते हैं, उनके पिछलों जन्मो के सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
 कार्तिक मास में स्नान करने वाले स्त्रियाँ कार्तिक शुक्ल एकादशी का शालिग्राम और तुलसी का विवाह रचाती है।

 वैसे तो तुलसी विवाह कि कई कथाएं हैं मगर हम जो कथा विशेष रूप से तुलसी विवाह पर कहते हैं वो इस प्रकार है ------

एक माँ की २ पुत्रियां थीं उनमें  से एक उसकी सौतेली बेटी थी, जिस कारण से वह उससे द्वेश रखती थी। मगर पुत्री उसे अपनी सगी माँ की ही तरह मानती थी और वह पूरे कार्तिक मास में तुलसी जी की पूजा करती व् विवाह विधि पूर्वक करती थी जिससे उसकी माँ उससे नाराज रहती थी। 

जब वह विवाह के लायक हुई तो माँ ने उसका विवाह तय कर दिया मगर उसके विवाह पर उसे दहेज़ की जगह तुलसी पत्र और मंजरी ही दे दिया। 

पुत्री के विदा के समय नाउ भी साथ में भेजा ताकि वह आकर उसके ससुराल का समाचार सुनाये। रस्ते में जब सभी बारातियों को भूख लगी तब उन्होंने पात्र खोलकर देखा तो उसमें तरह-तरह के फल ,मेवा और मिष्ठान थे जिन्हें उन सभी ने बड़े चाव से खाया। 

घर से जब उसका नाउ वापस चलने लगा तो उस पुत्री ने उसे २ तुलसी पत्र  दिए ,जब वह घर आया तो वे तुलसी पत्र  सोने की गिन्नी के रूप में बदल गए। 

यह देखकर उस स्त्री ने अपनी सगी बेटी को भी तुलसी की पूजा के लिया कहा और उसे भी कहा कि वो तुलसी पत्र और मंजरी को घड़े में संभालकर रखे, तथा शीघ्र ही उसका भी विवाह कर दिया ,विदा के समय उसके साथ भी उसी तरह मंजरी और तुलसी पत्र रख दिए जैसे अपनी सौतेली बेटी के साथ रखे थे। 

जब रस्ते में बारातियों ने पात्र खोले तो उनमें मिट्टी और तुलसी पत्र के अतिरिक्त कुछ नहीं था जिसके कारण  वे सभी नाराज हुए और बुरा भला कहने लगे। 

इधर जब माँ को पता चला तो वो अपनी सौतेली बेटी पर बहुत नाराज हुई और कहा तूने जादू  -टोना किया है। 

तब पुत्री ने कहाँ माँ मैं तो मन से तुलसी पूजा करती थी और इसके कारण मुझे तुलसा महारानी का आशीर्वाद मिला है। 

तब माँ को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने भी तभी  से तुलसी पूजन आरम्भ कर दिया। 

 तुलसी विवाह के सुअवसर पर व्रत रखने का बड़ा ही महत्व है. आस्थावान भक्तों के अनुसार इस दिन श्रद्धा-भक्ति और विधिपूर्वक व्रत करने से व्रती के इस जन्म के साथ-साथ पूर्वजन्म के भी सारे पाप मिट जाते हैं और उसे पुण्य की प्राप्ति होती है.
इस दिन इस तरह की रंगोली या चौक पूरते (बनाते) हैं और सिंघाड़े, शकरकंद  आदि  से पूजन करते हैं


anvla navmi

दीपावली के बाद आने वाली कार्तिक मास की नवमी को आँवला नवमी कहते हैं। आँवला नवमी पर आँवले के वृक्ष के पूजन का महत्व है। साथ ही पुत्र रत्न की प्राप्ति हेतु इस नवमी पूजन का विशेष महत्व है। 
आंवला नवमी को अक्षय नवमी के रूप में भी जाना जाता है।  ऐसा मन गया है कि इस दिन सतयुग का प्रारंभ हुआ था। कहा जाता है कि आंवला भगवान विष्णु का पसंदीदा फल है। आंवले के वृक्ष में समस्त देवी-देवताओं का निवास होता है। इसलिए इस की पूजा करने का विशेष महत्व होता  है। 
एक कथा के अनुसार पुत्ररत्न की प्राप्ति के लिए एक दिन एक वैश्य की पत्नी ने पड़ोसन के कहने पर पराए लड़के की बलि भैरव देवता के नाम पर दे दी। इस वध का परिणाम विपरीत हुआ और उस महिला को कुष्ट रोग हो गया तथा लड़के की आत्मा सताने लगी। 
बाल वध करने के पाप के कारण शरीर पर हुए कोढ़ से छुटकारा पाने के लिए उस महिला ने गंगा के कहने पर कार्तिक की नवमी के दिन आँवला का व्रत करने लगी। ऐसा करने से वह भगवान की कृपा से दिव्य शरीर वाली हो गई तथा उसे पुत्र प्राप्ति भी हुई। तभी से इस व्रत को करने का प्रचलन है।आँवले के वृक्ष के नीचे पूर्व दिशा में बैठकर पूजन कर उसकी जड़ में दूध देना चाहिए। इसके बाद पेड़ के चारों ओर कच्चा धागा बाँधकर कपूर, बाती या शुद्ध घी की बाती से आरती करते हुए सात बार परिक्रमा करनी चाहिए। 

इस वर्ष यह नवमी दिनांक ११ नवम्बर  २०१३ को पड़  रही है और आप सभी को आवंला नवमी की बहुत -बहुत शुभकामनाएं  

Friday, November 8, 2013

tulsi arti

कार्तिक मास में तुलसी पूजा का विशेष महत्त्व है ,पूरे माह तुलसी पूजन ,आरती ,प्रभात फेरी आदि का आयोजन मंदिरों में किया जाता है। घरों में भी तुलसी जी की पूजा की जाती है ,पूरे माह आरती पूजन के पश्चात एकादशी से कार्तिक पूर्णिमा तक विशेष प्रभात फेरियों का आयोजन किया जाता है ,और तुलसी विवाह किया जाता है।कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकादशी भी कहते हैं ,कुछ लोग इस दिन और कुछ लोग पूर्णिमा के दिन विधि -विधान से तुलसी विवाह करते है।  तुलसी पूजन में तुलसी आरती की जाती है और जो आरती हम बचपन से गाते आये हैं वो इस प्रकार है -----
 


           तुलसा महारानी नमो -नमो,हरी की पटरानी नमो -नमो। 

                                            धन तुलसी पूर्ण तप कीन्हो ,शालिग्राम बनी पटरानी। 

                                            जाके पत्र मंजर कोमल ,श्रीपत चरण कमल लपटानी।

                                            धूप -दीप -नवैद्य आरती, पुष्पन की वर्षा महारानी।

                                            छपपन भोग छत्तीसों व्यंजन ,बिन तुलसी हरी एक न मानी।

                                             सभी सखी मैया तेरो यश गावैं ,भक्ति दान दीजै महारानी। 

                                                       नमो -नमो तुलसा महारानी ,नमो -नमो तुलसा महारानी। ।

इस आरती के अतिरिक्त जो आरती आजकल आरती संग्रह की पुस्तकों में हैं वो इस प्रकार है --------


                        जय जय तुलसी  माता,

सबकी सुखदाता वर माता |

सब योगों के ऊपर,
सब रोगों के ऊपर,
रज से रक्षा करके भव त्राता |

बहु पुत्री है श्यामा, सूर वल्ली है ग्राम्या,
विष्णु प्रिय जो तुमको सेवे सो नर तर जाता |

हरि के शीश विराजत त्रिभुवन से हो वंदित,
पतित जनों की तारिणि तुम हो विख्याता |

लेकर जन्म बिजन में, आई दिव्य भवन में,
मानव लोक तुम्हीं से सुख संपति पाता |

हरि को तुम अति प्यारी श्याम वर्ण सुकुमारी,
प्रेम अजब है श्री हरि का तुम से नाता |

जय जय तुलसी माता |

                   

Monday, November 4, 2013

annkoot pooja

दीपावली के दूसरे (next day )दिन अन्नकूट या गोवर्धन की पूजा की जाती है। . पौराणिक कथानुसार यह पर्व द्वापर युग में आरम्भ हुआ था क्योंकि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने गोवर्धन और गायों के पूजा के निमित्त पके हुए अन्न भोग में लगाए थे, इसलिए इस दिन का नाम अन्नकूट पड़ा. 
इस दिन  बृज में धूमधाम से छपपन भोग लगाकर इस पर्व को मनाया जाता है ,ये पर्व व्रज वासियों का विशेष रूप से है। 

कथा-----पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस पर्व को मनाये जाने  की कथा इस प्रकार है ------

कथा यह है कि देवराज इन्द्र को अभिमान हो गया था. इन्द्र का अभिमान चूर करने हेतु भगवान श्री कृष्ण जो स्वयं लीलाधारी श्री हरि विष्णु के अवतार हैं ने एक लीला रची. प्रभु की इस लीला में यूं हुआ कि एक दिन उन्होंने देखा के सभी बृजवासी उत्तम पकवान बना रहे हैं और किसी पूजा की तैयारी में जुटे. श्री कृष्ण ने बड़े भोलेपन से मईया यशोदा से प्रश्न किया ” मईया ये आप लोग किनकी पूजा की तैयारी कर रहे हैं” कृष्ण की बातें सुनकर मैया बोली लल्ला हम देवराज इन्द्र की पूजा के लिए अन्नकूट की तैयारी कर रहे हैं. मैया के ऐसा कहने पर श्री कृष्ण बोले मैया हम इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं? मैईया ने कहा वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती है उनसे हमारी गायों को चारा मिलता है. भगवान श्री कृष्ण बोले हमें तो गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गाये वहीं चरती हैं,  इस दृष्टि से गोर्वधन पर्वत ही पूजनीय है और इन्द्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते व पूजा न करने पर क्रोधित भी होते हैं अत: ऐसे अहंकारी की पूजा नहीं करनी चाहिए.
गोकुल वासियों ने जब ऐसा करने को मना किया तो नन्द जी ने कहा ,"जब कान्हा कह रहे हैं तो हम सबको गोवर्धन की पूजा ही करनी चाहिए। 
 लीलाधारी की लीला और माया से सभी ने इन्द्र के बदले गोवर्घन पर्वत की पूजा की. देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी. प्रलय के समान वर्षा देखकर सभी बृजवासी भगवान कृष्ण को कोसने लगे कि, सब इनका कहा मानने से हुआ है. तब मुरलीधर ने मुरली कमर में डाली और अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्घन पर्वत उठा लिया और सभी बृजवासियों को उसमें अपने गाय और बछडे़ समेत शरण लेने के लिए बुलाया. इन्द्र कृष्ण की यह लीला देखकर और क्रोधित हुए फलत: वर्षा और तेज हो गयी. इन्द्र का मान मर्दन के लिए तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि आप पर्वत पर रहकर वर्षा की गति को नियत्रित करें और शेषनाग से कहा आप मेड़ बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोकें.
जब लगातार ७ दिनों तक की गयी मूसलाधार वर्षा से भी बृजवासियों का कुछ नहीं बिगड़ा तब इंद्र देवता ने विचार किया ये कोई साधारण मनुष्य नहीं हो सकते ,और वे ब्र्ह्मा जी के पास पहुँच गए और सारा वृतांत सुनाया ,तब ब्र्ह्मा जी ने बताया ये स्वयं साक्षात्  भगवान्  विष्णु जी हैं . तब इंद्र जी अत्यंत लज्जित होकर कृष्ण जी के पास पहुंचे और क्षमा प्रार्थना की। 
इस पराणिक घटना के बाद से ही गोवर्घन पूजा की जाने लगी. बृजवासी इस दिन गोवर्घन पर्वत की पूजा करते हैं. गाय बैल को इस दिन स्नान कराकर उन्हें रंग लगाया जाता है व उनके गले में नई रस्सी डाली जाती है. गाय और बैलों को गुड़ और चावल मिलाकर खिलाया जाता है.

इस कथा में एक रोचक कथा ये भी है कि जब सारे गोकुलवासी वापस अपने-अपने घर गए तब वहाँ पानी नाममात्र के लिए भी नहीं था ,तब गोकुलवासियों ने कान्हा से कहा ,"इतनी वर्षा का पानी जो हमारे घरों में था कहाँ गया "तब कान्हा ने कहा "आप सबने गोवर्धन पर्वत को खाना खिलाया था और किसी ने पानी पिलाया था क्या "तो सारा पानी गोवर्धन ने ही पी लिया है "

Saturday, November 2, 2013

deepawali 30 October 2016

                                         दीपावली की पूजा ,सामिग्री ,विधि

                                   

असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक तथा अंधेरों पर उजालों की छटा बिखेरने वाली हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार दीपावली कार्तिक मास की अमावस्या के दिन पूरे भारतवर्ष में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है. इसे रोशनी का पर्व भी कहा जाता है. दीपावली त्यौहार हिन्दुओं के अलावा सिख, बौध तथा जैन धर्म के लोगों द्वारा भी हर्षोल्लास पूर्वक मनाया जाता है. यूं तो इस महापर्व के पीछे सभी धर्मों की अलग-अलग मान्यताएं हैं, परन्तु हिन्दू धर्म ग्रन्थ में वर्णित कथाओं के अनुसार दीपावली का यह पावन त्यौहार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के 14 वर्ष के बाद बनवास के बाद अपने राज्य में वापस लौटने की स्मृति में मनाया जाता है. इस प्रकाशोत्सव को सत्य की जीत व आध्यात्मिक अज्ञानता को दूर करने का प्रतीक भी माना जाता है.

 दीपावली भगवान श्री राम के अयोध्या वापसी की खुशी में मनाई जाती है। इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा का विधान है।

पूजन सामग्री -

- कलावा, रोली, सिंदूर, १ नारियल, अक्षत, लाल वस्त्र , फूल, 5 सुपारी, लौंग,  पान के पत्ते, घी, कलश, कलश हेतु आम का पल्लव, चौकी, समिधा, हवन कुण्ड, हवन सामग्री, कमल गट्टे, पंचामृत ( दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल), फल, बताशे, मिठाईयां, पूजा में बैठने हेतु आसन, हल्दी , अगरबत्ती, कुमकुम, इत्र, दीपक, रूई, आरती की थाली.

विधि -------  

चौकी को धोकर उसके ऊपर लाल कपडा बिछाएं इसके ऊपर गणेश एवं लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें ,और जिस जगह मूर्ति स्थापित करनी हो वहां कुछ चावल रखें. इस स्थान पर क्रमश: गणेश और लक्ष्मी की मूर्ति को रखें. 

 चौकी पर लक्ष्मी व गणेश की मूर्तियाँ इस प्रकार रखें कि उनका मुख पूर्व या पश्चिम में रहें. लक्ष्मीजी,गणेशजी की दाहिनी ओर रहें. पूजनकर्ता मूर्तियों के सामने की तरफ बैठे. कलश को लक्ष्मीजी के पास चावलों पर रखें. नारियल को लाल वस्त्र में इस प्रकार लपेटें कि नारियल का अग्रभाग दिखाई देता रहे व इसे कलश पर रखें. यह कलश वरुण का प्रतीक है.

 घड़े या लोटे पर मोली बांधकर कलश के ऊपर आम का पल्लव रखें. कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत, मुद्रा रखें. कलश के गले में मोली लपेटें.  नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें. 

 

लक्ष्मी पूजन विधि

आप हाथ में अक्षत, पुष्प और जल ले लीजिए. कुछ द्रव्य भी ले लीजिए. द्रव्य का अर्थ है कुछ धन. यह सब हाथ में लेकर संकसंकल्प मंत्र को बोलते हुए संकल्प कीजिए कि मैं अमुक व्यक्ति अमुक स्थान व समय पर अमुक देवी-देवता की पूजा करने जा रहा हूं जिससे मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हो. सबसे पहले गणेश जी व गौरी का पूजन कीजिए

हाथ में थोड़ा-सा जल ले लीजिए और आह्वाहन व पूजन मंत्र बोलिए और पूजा सामग्री चढ़ाइए. हाथ में अक्षत और पुष्प ले लीजिए और नवग्रह स्तोत्र बोलिए. 

घर के सभी सदस्य मिलकर हवन की विधि पूरी करें। 

लक्ष्मी जी का मन्त्र है ---ॐ  ह्रीं क्लीं कमले कमलालय प्रसीद प्रसीद ॐ ह्रीं क्लीं महालक्ष्मी नमः स्वाहा (इस मन्त्र का १०८ आहुति से हवन करें ,और फिर गायत्री मन्त्र का घी से आहुति देकर हवन समाप्त करें )

अंत में महालक्ष्मी जी की आरती के साथ पूजा का समापन  कीजिये

जो लोग  चित्रगुप्त महाराज जी की पूजा भी आज के दिन करते हैं वो अपनी पुस्तक ,पेन और बहीखाता आदि को चित्रगुप्त की मूर्ति के समक्ष रख कर अक्षत से पूजन करें।

ये पूजन विधि गृहस्थ लोगों के लिया आसान विधि है मगर जिन लोगों को विशेष पूजन करना होता हिअ उन्हें घर पर पंडित बुलाकर पूजा करनी चाहिए . 

                        आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं।

Friday, November 1, 2013

narak chaturadshi

नरक चतुर्दशी पर्व का सम्बन्ध साफ़-सफाई से विशेष है ,कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को "नरक चतुर्दशी" मनायी जाती है। कुछ जगह इसे छोटी दीवाली के रूप में भी मनाया जाता है। 
कथाओं के अनुसार आज ही के दिन भगवान कष्ण ने नरकासुर नाम  के दैत्य का संहार किया था। आज के दिन मृत्यु के देवता यमराज के लिए दीप दान भी किया जाता है।
नरक चतुर्दशी की कथाः पुराने समय की बात है रन्तिदेवी नाम के राजा हुए थे। रन्तिदेवी अपने पूर्व जन्म में काफी धार्मिक व दानी थे, इस जन्म में भी दान पुण्य में ही समय बिताया था। कोई पाप किया याद न था लेकिन जब अंतिम समय आया तो यमदूत लेने आए। राजा ने यमदूतों से पूछा कि मैंने तो काफी दान पुण्य किया है कोई पाप नहीं किया फिर यमदूत क्यों आए हैं मतलब मैं नरक में जांऊगा।
 राजा रन्तिदेवी ने यमदूतों से एक वर्ष की आयु की माँग की। यमदूतों ने राजा की प्रार्थना स्वीकार कर ली और बताया कि एक बार तुम्हारे द्वार से एक ब्राह्मण भूखा वापस लौट गया था इस कारण नरक भोगना पडेगा।
      राजा ने ऋषि मुनियों से जाकर अपनी व्यथा बताई। ऋषियों ने कहा कि राजन् तुम कार्तिक मास की कष्ण पक्ष की चतुर्दशी का व्रत करो और इस ब्राह्मणों को भोजन कराओ और अपना अपराध सबके सामने स्वीकार कर क्षमा याचना करो। ऐसा करने से तुम पाप से मुक्त हो जाओगे।
      राजा ने ब्राह्मणों के कहे अनुसार  कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को व्रत रखा व सब पापों से मुक्त हो विष्णु लोक चला गया।

 कई घरों में रात को घर का सबसे बुजुर्ग सदस्य एक दिया जला कर पूरे घर में घुमाता है और फिर उसे ले कर घर से बाहर कहीं दूर रख कर आता है. घर के अन्य सदस्य अंदर रहते हैं और इस दिये को नहीं देखते. यह दीया यम का दीया कहलाता है और माना जाता है कि पूरे घर में इसे घुमा कर बाहर ले जाने से सभी बुराइयां और कथित बुरी शक्तियां घर से बाहर चली जाती हैं.

 विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति को मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं और उसका जीवन नरक की यातनाओं से मुक्त हो जाता है।

इस वर्ष नरक चतुर्दशी दिनांक २ नवंबर दिन शनिवार २०१३ को पड़  रही है ,आप सभी को दीपावली कि हार्दिक शुभकामनाएं। । …