Tuesday, December 31, 2013

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                                       कठिन प्यारे इस माले का जपना कठिन है --२ 

  १. मात-पिता और गुरु अपने की -मात-पिता और गुरु अपने की,

                   कठिन प्यारे इन तीनों की आज्ञा कठिन है,,,, कठिन प्यारे इस माले का जपना कठिन है ----

२. सास-ससुर और पति अपने की -सास ससुर और पति अपने की ,

                  कठिन प्यारे इन तीनों की सेवा कठिन है ,,,कठिन प्यारे इस माले का जपना कठिन है ------

३. गंगा -यमुना और त्रिवेणी ,गंगा-यमुना और त्रिवेणी ,

                  कठिन प्यारे इन तीनों का संगम कठिन है ,,,,कठिन प्यारे इस माले का जपना कठिन है --------

४. राम -लक्ष्मण और जानकी ,राम-लक्ष्मण और जानकी ,

                   कठिन प्यारे इन तीनों के दर्शन कठिन हैं ,,,,,कठिन प्यारे इस माले का जपना कठिन है -----

Sunday, December 29, 2013

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                     बेला अमृत गया,आलसी सो रहा बन अभागा ,साथी सारे जगे तू न जागा ॥

१. कर्म उत्तम से नर तन ये पाया,आलसी बन के हीरा गँवाया ,

                                         होवे उलटी मति ,करके अपनी छति ,विष में पागा ,साथी सारे जगे तू न जागा ॥ 

२. झोलियाँ भर रहे भाग वाले ,लाखों पतिको ने जीवन ,

                                       रंक राजा बने, भक्ति रस में पगे ,कष्ट भागा ,साथी सारे जगे तू न जागा ॥ 

३. धर्म -वेदों को न देखा भाला, बेला अमृत गया न सम्भाला ,

                                       सौदा घाटे का कर,हाथ माथे पे धर रोने लागा,साथी सारे जगे तू न जागा ॥ 

४. ब्रह्म -व्यापक न तूने विचारा ,सर से ऋषियों का ऋण न उतारा ,

                                       हंस का रूप था,गंदा पानी पिया बन के कागा ,साथी सारी जगे तू न जागा ॥   

Friday, December 27, 2013

safla ekadashi vrat


सफला एकादशी का व्रत मनोनुकूल फल प्रदान करने वाला है.  इस एकादशी के व्रत से व्यक्तित को जीवन में उत्तम फल की प्राप्ति होती है और वह जीवन का सुख भोगकर मृत्यु पश्चात विष्णु लोक को प्राप्त होता है. यह व्रत अति मंगलकारी और पुण्यदायी है.
पौष मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी को सफला नामक एकादशी कहा गया है। जो व्यक्ति सफला एकादशी के दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करता है। रात्रि में जागरण करते हैं ईश्वर का ध्यान और श्री हरि के अवतार एवं उनकी लीला कथाओं का पाठ करता है उनका व्रत सफल होता है।
सूत जी ने कहा है कि युधिष्ठिर ने कृष्ण से पूछा कि माघ मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या महात्मय एवं विधान है ,
                युधिष्ठर के प्रश्न् को सुनकर श्री कष्ण ने कहा एक थे राजा महिष्मति उनके पांच पुत्रों में सबसे बड़ा पुत्र बहुत ही अधर्मी था. वह सदा नीच कर्म करता था. शास्त्रों में जो भी पाप कर्म बताये गये हैं वह उन सभी मे लिप्त रहता था. धर्मात्मा राजा अपने पुत्र के स्वभाव एवं व्यवहार से अत्यंत दुखी था. पुत्र के इस नीच कर्म को देखकर राजा ने उसका नाम लुम्भक रख दिया और उसे उत्तराधिकार से वंचित कर देश त्यागने का आदेश दिया.
पिता द्वारा अधिकार से वंचित किये जाने एवं देश से बाहर निकाल दिए जाने पर लुम्भक धनहीन हो गया. जीवन की रक्षा के लिए तब लुम्भक ने राज्य में चोरी करना शुरू कर दिया. एक दिन कोतवालों ने उसे चोरी करते पकड़ लिया और राजा के समक्ष ले जाने लगे तब उसने अपने आपको राजकुमार बताया जिससे सैनिकों ने लुम्भक को मुक्त कर दिया. अब लुम्भक जंगल में कंद मूल, फल एवं पशु पक्षियों के मांस पर आश्रित रहने लगा.
 सौभाग्य से माघ महीने की कृष्ण पक्ष में दशमी तिथि को उसे कुछ भी खाने को नहीं मिला और वह भूखा-प्यासा ही सो गया लेकिन भूख के कारण उसे नींद भी नहीं आ रही थी ,, उसका शरीर ठंढ से अकड़ गया और वह अचेत हो गया. अगले दिन जब उसकी नींद खुली तब दिन के दो-पहर गुजर चुके थे. वह जल्दी जल्दी कंद मूल इकट्ठा करने निकल चला क्योंकि उसे लग रहा था कि अगर आज रात भी भूखा रहना पड़ा तो मृत्यु निश्चित है.
कंद मूल एवं फल इकट्ठा करते हुए कैसे सांझ ढल गयी लुम्भक को पता भी नहीं चला. जब वह अपने आश्रयदाता पीपल वृक्ष के पास पहुंचा तब काफी रात हो गयी थी और वह काफी थक भी गया था. इस स्थिति में उसने एकत्रित  किये गये फलादि को पीपल की जड़ में रख कर विष्णु का नाम लेकर सो गया लेकिन ठंढ़ ने उसे इस रात भी सोने नहीं दिया. सुबह आकाशवाणी हुई कि तुमने अनजाने ही सफला एकादशी का व्रत कर लिया जिसके पुण्य से तुम राजा बनोगे और पुत्र सुख प्राप्त करोगे.
इस घटना के पश्चात, जंगल के जीवन से जब लुम्भक दुर्बल होता जा रहा था तो उसके मन में आया कि क्यों न फिर से चोरी की जाये,   सो वह शहर की ओर चल पड़ा. संयोग कि बात है कि वह जिस घर में प्रवेश किया उसमें एक साधु रहता था. साधु के घर में उसे कुछ भी नहीं मिला लेकिन उसकी आहट से साधु की नींद खुल गयी और उसने उसे भोजन कराया और प्यार से बातें की.
साधु की बातों एवं व्यवहार से प्रभावित होकर लुम्भक साधु के साथ ही रहने लगा. साधु की संगत और संस्कार ने उसके विचार एवं व्यवहार को बदल दिया और वह सदाचारी बन गया. राजकुमार का स्वभाव जब परिवर्तित हो गया तब उस साधु ने बताया कि वह साधु और कोई नहीं उसका पिता राजा महिष्मति है.
महिष्मति ने अब लुम्भक को अपना उत्तराधिकारी बनाया और वह कई वर्षो तक धर्मानुसार शासन करता हुआ एक दिन अपने पुत्र को राज्य संप कर सन्यास ग्रहण कर श्री हरि की भक्ति में लीन हो गया और मृत्यु पश्चात मोक्ष को प्राप्त हुआ.

इस दिन नारियल,नीबू,सुपारी आदि अर्पण करके नारायण की पूजा करनी चाहिए और तिल व् गुड़ का सागर लेना चाहिए ।

Wednesday, December 18, 2013

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                                           आना पवन कुमार हमारे घर कीर्तन में ----------

१. आप भी आना संग राम जी को लाना ,

                    लाना जनक दुलारी हमारे घर कीर्तन मे --------आना पवन कुमार ---

२.  भारत जी को लक्ष्मण जी को ,

                  लाना राज दरबार ,हमारे घर कीर्तन में ---------आना पवन कुमार 

३. कृष्ण जी को लाना ,राधा जी को लाना ,

                 लाना सब परिवार, हमारे घर कीर्तन में ----------आना पवन कुमार 

४. शंकर जी को लाना ,नारद जी को लाना ,

               डमरू वीणा बजाना ,हमारे घर कीर्तन में ----------आना पवन कुमार

५. सुमति को लाना ,कुमति को हटाना ,

               करना बेडा पार ,हमारे घर कीर्तन में ------आना पवन कुमार 

६. आप भी आना , संग में भैरों जी को लाना ,

              लाना प्रेत राज सरकार, हमारे घर कीर्तन में --------------आना पवन कुमार 

७. हम भक्तों पर कृपा करके ,

            सुन लो नाथ पुकार, हमारे घर कीर्तन में --------आना पवन कुमार

Monday, December 9, 2013

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                             जीवन के आधार हमारे राधेश्याम ,भज लो बारम्बार हमारे राधेश्याम ,

 

१. चल के फिर ,के रोके-गाके ,दुःख में सुख में मन समझाकर ,

                                       कहो पुकार -पुकार हमारे राधेश्याम ॥ 

२. जय योगेश्वर ,कृष्ण मुरारी ,भक्ति भाव में लीलाधारी ,

                                      करते भव से पार ,हमारे राधेश्याम ॥ 

३. ह्रदय रमन करुणा के सागर, अनुपम अति  सुंदर नटवर नागर ,

                                      स्वयं प्रेम आगार ,हमारे राधेश्याम ॥ 

४. कुछ ही दिन का यह जीवन है ,प्रभु ध्यान ही सुखमय धन है ,

                                     पथिक मुक्ति दातार ,हमारे राधेश्याम ॥