Tuesday, December 30, 2014

पौष मास पुत्रदा एकादशी दिनांक १ जनवरी २०१५ /pasuh ekadashi putrda ekadashi 1/1/2015


जो व्यक्ति और कोई भी एकादशी का व्रत नहीं रखते वे इस पुत्रदा एकादशी का व्रत करके अपनी मनोकामनाओं को पूर्ण कर सकते हैं ।

कथा ------

भगवान श्री कृष्ण जी बोले ---हे धर्म पुत्र ! पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है और इसके महात्मय की कथा इस प्रकार है --
एक समय भद्रवती नगर में संकेतमान नाम का राजा राज्य करता था ,उसकी स्त्री का नाम शैव्या था ,पूरा भवन विश्व-विभूतियों से भरा था,द्वार चिन्तामणियों से सुसज्जित था।  परन्तु राजा उदास था और उसे अपने चारों ओर अँधेरा महसूस होता था ,कारन की उसके कोई भी संतान नहीं थी। हजारों यज्ञ करने के बाद भी उसे कोई संतान नहीं हुई।
हर कर उसके मन में विष खाने और जंगल में जाने के विचार आने लगे थे ,फिर विचार किया आत्मघात करना महापाप है और फिर इस चिंता से मुक्त होने के लिए उसने वनवासियों से परामर्श लेने का विचार बनाया।
घोड़े पर सवार वन विहार करने लगा, वहां पशु-पक्षी इत्यादि जीवों को पुत्रों के साथ खेलता देखा मन में कहने लगा की ये मेरे से भी अधिक सौभाग्यशाली हैं।
आगे चला तो एक सरोवर मिला जिसमें मछलियाँ आदि जलचर भी अपनी संतानों के साथ विहार कर रहे थे ,
चारों तरफ मुनियों के आश्रम थे ,राजा घोड़े से उतरे और मुनियों की शरण में गए ,प्रणाम किया और अपना दर्द कहा ,मुनि बोले हम विश्व के देवता हैं और इस सरोवर को पतित पवन समझ कर यहाँ स्नान करने आये हैं ,आज पुत्रदा एकादशी है जो पुत्र की इच्छा को पूर्ण करता है।
राजा बोला क्या यह दिव्य फल मुझे इस व्रत के फल से मुझे भी प्राप्त हो जायेगा ,विश्वदेव बोले -राजन हमारी बात सत्य होगी।
राजा ने पूर्ण श्रद्दा के साथ स्नान किया और पुत्रदा एकादशी का व्रत किया ,रात्रि जागरण किया और भवन में चला गया। पुत्रदा एकादशी के फल से उसे पुत्र की प्राप्ति हुई ,कथा को सुनने मात्र से ही स्वर्ग मिलता है ऐसी मान्यता है।

इस दिन नारायण जी की पूजा की जाती है ,इस दिन गौ के दूध का सागर लिया जाना चाहिए ।

Sunday, December 21, 2014

bhajan/भजन

          गुरु पास रहे या दूर रहे नज़रों में समाये रहते हैं, 
         इतना तो बता दे कोई मुझे क्या कृपा इसी को कहते हैं । 
१. जीवन की घड़ियाँ छोटी हैं,दुनिया की मंजिल लम्बी है ,
छोड़ो  गुरु पर जिम्मेदारी गुरु आप सम्हाले रहते हैं -- गुरु पास रहे -------

२. सुख में भी आप नज़र आते ,दुःख में भी धीरज बंधवाते ,
दुःख -सुख समझो एक समान गुरु याद दिलाते  रहते हैं ----गुरु पास रहे---

३. जिस अंश के हम सब प्राणी हैं,उस अंश के हैं सारे प्राणी ,
माया में फंसकर भूल गए ,गुरु याद दिलाते रहते हैं---गुरु पास रहे या ------
 

 

Saturday, October 18, 2014

dhantryodashi/धनतेरस /धनत्रयोदशी /दिनांक 9 नवंबर २०१५

धनतेरस दीपावली के २ दिन पहले त्रयोदशी को मनायी जाती है।  इस दिन मृत्यु के देवता यम और धन के देवता कुबेर की पूजा का विशेष महत्त्व है
कहा जाता है कि इस दिन धन्वन्तरि का जन्म हुआ था और जिस समय उनका अवतरण हुआ था उनके हाथ में कलश था और इसी कारण इस दें नए बर्तन खरीदने के परम्परा है। और बरतन चाँदी ,पीतल या तांबे का लेना चाहिए ,स्टील का बरतन नहीं लेना चाहिए।मन जाता है की स्टील में लोहे का अंश होता है और इसीलिए स्टील का बर्तन नहीं लिया जाना चाहिए ॥

धनतेरस के दिन चांदी खरीदने की भी प्रथा है. इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में संतोष रूपी धन का वास होता है.

धनतेरस की शाम घर के बाहर मुख्य द्वार पर और आंगन में दीप जलाने की प्रथा भी है.धनतेरस के संदर्भ में एक लोक कथा प्रचलित है कि एक बार यमराज ने यमदूतों से पूछा कि प्राणियों को मृत्यु की गोद में सुलाते समय तुम्हारे मन में कभी दया का भाव नहीं आता क्या. दूतों ने यमदेवता के भय से पहले तो कहा कि वह अपना कर्तव्य निभाते है और उनकी आज्ञा का पालन करते हें परंतु जब यमदेवता ने दूतों के मन का भय दूर कर दिया तो उन्होंने कहा कि एक बार राजा हेमा के ब्रह्मचारी पुत्र का प्राण लेते समय उसकी नवविवाहिता पत्नी का विलाप सुनकर हमारा हृदय भी पसीज गया लेकिन विधि के विधान के अनुसार हम चाह कर भी कुछ न कर सके.
 कथा के अनुसार किसी समय में एक राजा थे जिनका नाम हेम था. दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. ज्योंतिषियों ने जब बालक की कुण्डली बनाई तो पता चला कि बालक का विवाह जिस दिन होगा उसके ठीक चार दिन के बाद वह मृत्यु को प्राप्त होगा. राज इस बात को जानकर बहुत दुखी हुआ और राजकुमार को ऐसी जगह पर भेज दिया जहां किसी स्त्री की परछाई भी न पड़े. दैवयोग से एक दिन एक राजकुमारी उधर से गुजरी और दोनों एक दूसरे को देखकर मोहित हो गये और उन्होंने गन्धर्व विवाह कर लिया.
विवाह के पश्चात विधि का विधान सामने आया और विवाह के चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राण लेने आ पहुंचे. जब यमदूत राजकुमार प्राण ले जा रहे थे उस वक्त नवविवाहिता उसकी पत्नी का विलाप सुनकर उनका हृदय भी द्रवित हो उठा परंतु विधि के अनुसार उन्हें अपना कार्य करना पड़ा. यमराज को जब यमदूत यह कह रहे थे उसी वक्त उनमें से एक ने यमदेवता से विनती की हे यमराज क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु के लेख से मुक्त हो जाए. दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यमदेवता बोले हे दूत अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है इससे मुक्ति का एक सरल उपाय मैं तुम्हें बताता हूं ". कार्तिक कृष्ण पक्ष की रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीप माला दक्षिण दिशा की ओर भेट करता है उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा।

                         और तभी से धनतेरस के दिन दक्षिण दिशा की ओर दिया जलाया जाने लगा।

Tuesday, September 23, 2014

शारदीय नवरात्री /shardiy navratri 13 अक्टूबर २०१५


 नवरात्री का हिन्दू धर्म में बहुत महत्त्व है और इन दिनों माँ दुर्गा के भक्त माँ के नौ रूपों की विधिविधान से पूजा करते हैं ,शारदीय नवरात्री आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होकर नवमी तिथि को कन्या पूजन के साथ समाप्त की जाती है।  इस वर्ष यह नवरात्री दिनांक 13 अक्टूबर २०१५ से आरम्भ होकर अक्टूबर को समाप्त होगी।

 नौ दिनों तक चलने नवरात्र पर्व में माँ दुर्गा के नौ रूपों क्रमशः शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री देवी की पूजा का विधान है. नवरात्र के इन प्रमुख नौ दिनों तक देवी दुर्गा का पूजन, दुर्गा सप्तशती का पाठ इत्यादि धार्मिक किर्या कलाप संपन्न किए जाते हैं॥


पूजन में सर्वप्रथम स्वच्छ स्थान में माता की मूर्ती अपनी सामर्थ्य के अनुसार मिटटी,चांदी ,पीतल या फिर तस्वीर लेकर एक चौकी पर स्वच्छ लाल वस्त्र बिछाकर स्थापित करें ,अब एक मिटटी के पात्र में मिट्टी डालकर बीच में पीतल,ताम्बे या फिर मिटटी का कलश भरकर रखें ,इसमें थोड़ा सा शहद  डालें ,कलश के ऊपर एक पात्र मैं अक्षत डालें और इसके चारों ओर आम के पत्ते लगाएं । अब बाकि की मिट्टी में जौ  बो दें (इसे ही खेतड़ी कहा जाता है ) यदि स्वयं न कर सकें तो पुरोहित के द्वारा भी इस विधान को कराया जा सकता है । कलश की स्थापना के साथ ही नवदुर्गा पूजन का आरम्भ हो जाता है ,यदि आप नौ दिनों के लिए दीपक भी प्रज्वलित करना चाहते हैं तो इसी समय अखंड ज्योति भी जल कर रखें, अखंड ज्योति का स्थान हमेशा उत्तर पूर्व में रखें । और दुर्गा सप्तसती,दुर्गा चालीसा ,दुर्गा स्तुति से माँ को प्रसन्न करें ।

माँ के नौ रूपों की व्याख्या इस प्रकार है ------

  1. प्रथम हैं माँ शैलपुत्री ,हिमालय पुत्री होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा .
  2. नवरात्री के दुसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी   की पूजा का विधान है ,तप और जप करने के कारन इनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा  .
  3. माँ चंद्रघंटा की पूजा नवरात्री की तीसरे दिन की जाती है ,इस रूप में माँ के मस्तक पर अर्धचन्द्र बना है अतः इस रूप को चंद्रघंटा कहते हैं .
  4. चतुर्थी को माँ कूष्मांडा की अर्चना का विधान है .ऐसा कहा जाता है मंद हंसी के द्वारा माँ ने ब्रम्हांड को उत्पन्न किया .इसलिए इन्हें कुष्मांडा  कहा जाता है 
  5. चार भुजाओं वाली माँ स्कंदमाता की अर्चना पंचमी को की जाती है .
  6. जिनकी उपासना से भक्तों के रोग ,शोक ,भय ,और संताप का विनाश होता है ऐसी माँ कात्यायनी की उपासना छठे दिन की जाती है .
  7. काल से रक्षा करने वाली देवी कालरात्रि की उपासना सातवें दिन की जाती है .
  8. शांत रूप वाली ,भक्तों को अमोघ फल देने वाली देवी महागौरी की पूजा आठवें दिन की जाती है .
  9. भक्तों की  समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली देवी सिध्दात्री की पूजा नवें दिन की जाती है .
जो उपासक हवन विधि भी करना चाहते हैं वो प्रतिदिन हवन सामिग्री से हवन भी कर सकते हैं । यदि आप स्वयं हवन करना चाहें तो माता के सूक्ष्म मन्त्रों द्वारा हवन पूजन कर सकते हैं ।
यहाँ मैं उन मन्त्रों का उल्लेख कर रही हूँ ----
सर्वप्रथम हवन कुण्ड में लकड़ी रखें फिर जल से स्नान कराएं , कुमकुम लगाकर समिधा से हवन शुरू करें ।
१. ऐं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः स्वाहा ॥
२. ऐं ह्रीं क्लीं कनकवती स्वाहा ॥
३. ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डा विच्चै  नमः स्वाहा ॥

इन मन्त्रों का ११ बार आहुति दें ,,,तदुपरांत --

१. ॐ नमः स्वाहा ॥
२. ॐ श्री सद्गुरु देवाय नमः स्वाहा ॥
३. ॐ परमब्रहाय नमः स्वाहा ॥

इन मन्त्रों का ५ बार आहुति दें ।। 

इसके बाद २४ बार गायत्री मन्त्र से आहुति देकर अंत में भोग और बलि देकर हवन की विधि समाप्त करें ,यहाँ बलि का आशय किसी जीव की बलि से बिलकुल नहीं है बल्कि आप साबुत सुपारी के द्वारा बलि दें और फिर पान खिलाकर देवी को विदा करें।  तत्पचात स्वय प्रसाद ग्रहण कर फलहार लें ।

दोस्तों मैंने अपने ब्लॉग में पहले भी माता की अर्चना पूजा बहुत विस्तार से लिखी है यदि आप सीए देखना चाहें तो कृपा करके इस लिंक को क्लिक करें ----


http://archanpuja.blogspot.in/2014/03/navratri-shubhaarmbh-31-march-2014.html


Tuesday, August 19, 2014

aja ekadashi/अजा एकादशी /21 अगस्त 2014/वीरवार


भाद्र पक्ष की कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी मनाई जाती है । इस व्रत में आत्मशुद्धि तथा अध्यात्मिकता का मार्ग खुलता है ।


कथा----

  •   सूर्य वंश में राजा हरिश्चन्द्र का जन्म अयोध्या नगरी में हुआ था। राजा हरिश्चन्द्र के द्वार पट पर एक श्याम पट लगा था और जिसमें मडीयों से लिखा था ,"इस द्वार पर मुंह माँगा दान दिया जाता है ,कोई भी खाली हाथ नहीं जाता है "

    महर्षि विश्वामित्र ने पढ़ कर कहा यह लेख मिथ्या है।  राजा बोले 'आप परीक्षा कर लें महाराज "

    विश्वामित्र बोले --अपना राज्य मुझे दे दो। राजन ने कहा राज्य आपका है ,और क्या चाहिए ? 

    विश्वामित्र बोले- : दक्षिणा भी तो लेनी है "रहू ,केतु और शनि की पीड़ा भोगनी सहज है ,साढ़ेसाती का कष्ट भी सुगम है ,मेरी परीक्षा में पास होने बड़ा ही कठिन है। आपको मुर्दे जलने होंगे ,आपकी पत्नी को दासी बनना पड़ेगा। यदि आप इन कष्टों से भय नहीं तो हमारे साथ काशी चलें। 

    राजा पत्नी और पुत्र के साथ काशी गए वहां स्वयं श्मशान में डोम (शवों को जलने के लिए लकड़ी बेचने वाले ) बने ,पत्नी दासी बनी। 

    राजा के पुत्र को नाग ने डस लिया परन्तु ऐसी विपत्ति में भी राजन ने सत्य का मार्ग नहीं त्यागा। 

    परन्तु मन में शोक उत्पन्न हुआ।  उस समय गौतम ऋषि ने राजा को अजा  एकादशी का व्रत विधि पूर्वक करने को कहा।  राजा ने विधिपूर्वक अजा  एकादशी का व्रत पूजन किया और इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से अपने पुत्र को जीवित पाया तथा पत्नी को आभूषणों से युक्त पाया।  एकादशी व्रत के प्रभाव से अनंत में स्वर्ग को प्राप्त हुए। 

    इस कथा के महात्म्य का फल अश्वमेघ यग्य के फल के सामान माना गया है। 

  • इस दिन बादाम था छुहारे का सागार लिया जाना चाहिए।


Thursday, July 24, 2014

भजन /bhajan

         कलयुग ये कैसी उलटी गंगा बहा रहा है, माता-पिता को बेटा ठोकर लगा रहा है । 


१. पहले था एक रावण और एक ही थी सीता -२
                           अब हर गली में रावण सीता चुरा रहा है ॥ 


२. बहनों से इतना कहना हरदम सतर्क रहना -२      
                         वो पापी भी अपनी कलाई पर राखी बंधा रहा है ॥ 

३. बच्चे तो हैं गरीब के भूखे तरस रहे हैं -२
                         पर सेठ जी का कुत्ता रबड़ी उड़ा रहा है ॥ 

Saturday, July 19, 2014

श्रावण माह और शिव पूजा

सावन का महीना शिव पूजा के लिए अति पवित्र माना गया है और इस माह में शंकर जी की पूजा विधि-विधान से की जाती है, कहा जाता है इस माह में शिव जी की आराधना से मनोकामनाएं पूर्ण होती है ,यूँ भी कहा जाता है शिव जी बहुत भोले हैं और बहुत ही जल्दी प्रसन्न हो जाते है।
शिव जी विल्व पात्र मात्र से ही प्रसन्न हो जाते है परन्तु उनकी विधिवत पूजा यदि की जाये तो शिव जी भगवान अति प्रसन्न होते है ।
कहते है जब समुद्र- मंथन हुआ और शिव जी ने हलाहल का पान किया तो उनके शरीर का ताप अचानक से बहुत अधिक बढ़ गया और इससे मुक्त करने के लिए इंद्र जी ने काफी वर्षा की जिससे उनके शरीर में ठण्ड पहुंची ,और ये माह सावन का था ,सर के बढ़ते हुए ताप को कम करने के लिए उनपर बिल्व पात्र चढ़ाये गए जिससे उन्हें शीतलता प्राप्त हुई ।
शिव जी को सोमवार अति प्रसन्न है ,इस समय बिल्व पात्र,धतूरा,कुसुम के फूल आदि आसानी से मिल जाते हैं जो की शिव जी को अत्यधिक पसंद हैं।
सावन के सोमवार के व्रत से शिव जी को प्रसन्न किया जाता है ,कुछ लोग सोलह सोमवार का व्रत भी सावन माह से उठाते हैं ।
यदि हो सके तो पूरे माह शंकर जी को बिल्व पत्र ,चीनी,चावल,तुलसी पत्र और धतूरे से पूजा की जानी चाहिए ।
संतान की सफलता ,उन्नति के लिए शिवलिंग का शहद या गन्ने के रस से अभिषेक करना चाहिए ,
यदि घर में अचानक परेशानिया आ रही हों तो रुद्राभिषेक कराने से लाभ मिलता है ,सावन में तेरस को शिव जी की विशेष पूजा से लाभ मिलता है ।
पूजन कैसे भी हो जरूरी है जितनी भी देर के लिए पूजन किया जाये पूर्ण मन से किया जाये । 

Thursday, June 19, 2014

वीरवार की कथा

दोस्तों ,वीरवार का व्रत हिन्दू परिवारों में ५०^% लोग रखते हैं और कथा की पुस्तकों में से इसकी कथा को या तो अकेले ही या फिर परिवार के लोगों के साथ बैठकर पढ़ते और पूजा करते हैं ,पहले मैं भी वीरवार का व्रत किया करती थी और हमारे परिवार के लगभग सभी लोग साथ बैठकर इसकी कथा सुनते थे ,धीरे-धीरे वक़्त बदला समय के अभाव  में अब कभी अकेले और कभी साथ में इसकी कथा का हम सभी आनंद उठाते हैं ।
दोस्तों मैं यहाँ किसी धार्मिक पुस्तक की कथा नहीं वरन जो कथा वर्षों से हमारे घर में कही जा रही उसका वर्णन करने जा रही हूँ. इस कथा को हमारे घर के एक बुजुर्ग ने प्रारम्भ किया था और आज भी इसी कथा को हम सुनते और सुनाते हैं ,तो चलिए आप सभी के सन्मुख मैं इस कथा को प्रस्तुत कर रही हूँ ---------

पूजन सामिग्री-------

चने की दाल ,गुड़ ,मुनक्का ,केला ,विष्णु भगवान की प्रतिमा या फोटो और केले का पेड़ (केले का पेड़ न हो तो केले के पत्ते को विश्नी भगवान की फोटो के पास लगा लें )
कोशिश करें की इस दिन पीले वस्त्र पहने। 

निषिद्ध ------

यदि कर सकें तो कोशिश करें की इस दिन परिवार के पुरुष शेव न बनाएं ,घर की विशेष सफाई जैसे जाला साफ़ करना आदि न करें ,धोभी को वस्त्र न दें साथ घर में भी वस्त्र न धोएं । 

कथा-------

बहुत पुरानी बात है एक राज्य का राजा अपने परिवार के साथ सुख समृद्धि के साथ जीवन  यापन कर रहा था ,। एक समय की बात थी की वह जंगल में शिकार खेलने गया ,वापस लौटते समय उसे एक बुढ़िया मिली और वह बोली राजन "मैंने बृहस्पति का व्रत रखा और मेरी कथा सुनने वाला कोई नहीं मिल रहा है क्या आप मेरी कथा सुन लेंगे मैं भूख और प्यास से दुखी हूँ "
राजन बोले , " हाँ मैं आपकी कथा सुन लूँगा ,आप कथा कहिये "
तब उस बुढ़िया ने कथा कही और प्रसाद के रूप में चने की दाल और गुड दिया।
प्रसाद को देखते ही राजा आग-बबूला हो गया और प्रसाद को फैंकते हुए बोला," यह प्रसाद देकर तुम मेरा अपमान कर रही हो इसे तो हमारे अस्तबल के घोड़े भी नहीं कहते हैं " ऐसा कहकर वह राजा वहां से चला गया ।
परन्तु प्रसाद की अवज्ञा के कारण उस राजा का राज-पाट धीरे-धीरे समाप्त होने लगा ,राजा अपना सब कुछ शतरंज मे हारता चला गया और परिवार के सदस्य धीरे-धीरे दूर चले गए ।
केवल राजा की छोटी बहु साथ में रह गयी ,राजा की छोटी बहु धार्मिक प्रवर्ति की थी और प्रतिदिन पूजा पाठ से निवृत होकर ही दूसरा काम करती थी।
एक दिन वह काफी उदास सी घर के बाहर बैठी थी तभी उधर से एक वृद्ध महिला गुजरी और उससे उसके उदास होने का कारण पूछा परन्तु राजा की बहु ने कुछ भी न बताया ,काफी पूछने पर उसने सारा वृतांत कह सुनाया । तब उस वृद्ध महिला ने कहा तुम विष्णु भगवान की पूजा और वीरवार का व्रत करो शायद तुम्हारे दुःख दूर हों ।
तब राजा की बहु ने वीरवार का व्रत विधविधान से करना शुरू कर दिया ,पहले जो राजा का व्यसन था शतरंज खेलना उसे ही उसने अब अपना रोजगार बना लिया , जब से बहु ने व्रत शुरू किया राजा को शतरं में जीत मिलने लगी ।
अब तो कोई भी वीरवार ऐसा नहीं जाता जब राजन अपनी बहु को कथा सुनाये बिना खेलने के लिए जाये ।
परन्तु एक दिन  भूल कर खेलने चला गया ,बहु बहुत देर तक भूखी प्यासी बैठी रही ,विष्णु भगवान से देखा नहीं गया और वे राजा का वेश बनाकर आये कथा कही और चले गए।
तभी राजा को याद आया और वो दौड़ते-भागते आये और बोले बहु आज बहुत देर हो गयी है चलो कथा कहता हूँ।
बहु ने कहा -"पिताजी अभी तो आप आये थे और कथा कही फिर ये कैसी बातें आप कर रहे हैं "
राजा बहुत परेशान हुआ और अगले वीरवार को न ही खुद बाहर गया और न ही बहु को कहीं जाने दिया ,जब काफी देर तक बहु भूखी-प्यासी पूजन के प्रतीक्षा में बैठी रही तब फिर से विष्णु भगवान आये और कथा आरम्भ कर दी।
जब राजा के कानों में कथा की आवाज आई तब भीतर जाकर देखा तो आश्चर्य चकित से रह गए ,वहां तो साक्षात विष्णु भगवान बैठे थे , राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और वो उनके पैरों में गिरकर रोने लगे ,और अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी ।
विष्णु भगवान तो दयालु थे ही उन्होंने राजन को क्षमा कर दिया ,और जाने लगे ,राजन ने उनके क़दमों में गिरकर कहने लगे,भगवन," अब मेरा यहाँ क्या का आप मुझे भी अपने साथ ले चलिए "
भगवान ने कहा कोई भी इस तरह से सशरीर  नहीं जाता ,राजन के बहुत कहने पर भगवान उसे साथ ले जाने लगे तब बहु ने कहा ,"मैं भी आपके बिना क्या करूंगी आप मुझे भी साथ ले चलिए "
भगवान की असीम कृपा से दोनों के लिए विमान आया जिसमें बैठकर दोनों स्वर्ग को गए । 


भगवान विष्णु की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि और शांति का निवास होता है ,इस दिन केला नहीं खाना चाहिए । 

Wednesday, June 4, 2014

nirjala ekadashi/निर्जला एकादशी

एकादशी का व्रत सभी व्रतों से श्रेष्ठ माना जाता है, साल भर में २४ एकादशी पड़ती हैं और जिस वर्ष मलमास  पड़ता है उस वर्ष २ एकादशी और बढ़ जाती हैं परन्तु इनमें से कुछ एकादशी का विशेष महत्व माना जाता है ,देवशयनी एकादशी ,देवउठावनी एकादशी और  एकादशी।
निर्जला एकादशी के व्रत में पूरे दिन बिना पानी पिए विष्णु की उपासना पूजा  व्रत को पूर्ण विधि के साथ रखने का विधान है ,परन्तु अत्यधिक गर्मी के कारण अधिकतर लोग इसे इस तरह से नहीं रखते हैं, मैं भी इस व्रत को पानी पीकर ही रखती हूँ ,फिर भी इस व्रत का विशेष महत्त्व माना गया है।
जरूरी यह नहीं की आप व्रत कैसे रखते हैं ,जरूरी है व्रत रहने की भावना और उपासना।
यूँ तो किसी भी एकादशी के व्रत में अन्न का निषेध है परन्तु निर्जला एकादशी के व्रत में अन्न के साथ-साथ जल का आचमन तक निषिद्ध है।

वर्ष २०१६ में यह एकादशी दिनांक १६ दिन वीरवार को पड़ रहा है -



निर्जल एकादशी का व्रत ज्येष्ठ माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को किया जाता है । इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है ।

इस दिन   स्नान आदि से निवृत होकर विष्णु भगवान् का पूजन करें ,और पितरों के निमित्त पंखा,छाता ,सोना चांदी , मिटटी घड़ा ,फल इत्यादि का दान करना चाहिए .संध्या काल में जो फलहार लेना चाहें मीठा फलहार लेकर ,रात्रि जागरण करें और साथ कीर्तन भी करें ।ॐ  नमो भगवते वासुदेव का जप करें ।
द्वादशी को स्नान से निवृत होकर ब्राम्हणों को दान और भोजन कराकर स्वयं भोजन ग्रहण करें .
इस एकादशी के माहात्म्य सुनने वाले को भी बहुत पुण्य  मिलता है ।


कथा -----

पांच पांडवों में भीम के अतिरिक्त सभी पांडव और माता कुंती के साथ द्रोपदी भी एकादशी का व्रत करते थे ,मगर भीम सेन अपनी पेट की अग्नि के कारण  व्रत रखने में असमर्थ थे ,जिसके कारण सभी उसे  शिक्षा देते थे अतः भीम परेशान होकर महर्षि व्यास के पास गए और बोले पुज्य ऋषिवर मेरे भाई व् माताजी एकादशी का व्रत करते हैं और मुझे भी व्रत के लिए कहते हैं ,परन्तु मैं बिना अन्न के नहीं रह पाता हूँ ,मेरे पेट में अग्नि का वास होने के कारण मैं व्रत नहीं रह पाता ,आप कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे सांप भी मर जाये और लाठी भी टूट जाये ।
तब व्यास जी ने कहा " जो भी कोई ज्येष्ठ माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करता है उसे २ ४ एकादशी के व्रत का फल प्राप्त होता है ,अतः तुम इस व्रत को श्रद्धा पूर्वक करो । इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होता है ।
व्यास जी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया और मोक्ष को प्राप्त किया।
  आप सभी को इस एकादशी की बहुत-बहतु शुभकामनाएं। ....
व्रत कैसे रखना है ये सब अपने-अपने सामर्थ्य और सुविस्ता के अनुसार ही रखना चाहिए ।

Wednesday, May 28, 2014

vat savitri vrat/वट सावित्री व्रत /28 may 2014


वट सावित्री की पूजा बचपन से ही  घर में देखती आई थी, मालूम था विवाह के बाद मुझे भी करना होगा ,एक बात हमेशा ही मन में खटकती रही है क्या पति की आयु के लिए सभी सुहागिनें व्रत पूजा करती हैं पर उनका क्या जो जीवन दूसरों को समर्पित कर अपनी आयु भी पति और पुत्र को न्योछावर करने के लिए पूरी श्रद्धा से समर्पित रहती है ,खैर जो भी हो शादी हुई और मैंने भी व्रत किया ,क्यूंकि घर की परम्परा थी निभाया ,चलिए जानते हैं की इस पूजा का महत्त्व क्या है और किस तरह किया जाता है -------------
वर्ष २०१५ में यह व्रत १ जून को पड़ रहा है -----
इस व्रत को सुहागिनें अपने पति की लम्बी आयु के लिए करती है ,और वटवृक्ष की पूजा करती हैं ,
जैसा की सभी ने इससे सम्बंधित कथा को पढ़ा और सुना ही होगा कि इस पूजा का आरम्भ सावित्री के वटवृक्ष की पूजा करने के बाद ही आरम्भ हुआ है।
हमारे हिन्दू धर्म में अक्सर सभी व्रत व् पूजा बड़े ही विधिविधान से किये जाते है ,हिन्दू स्त्रियां अपने घर में भी प्रतिदिन की पूजा भी बड़ी ही विधि पूर्वक करती हैं ,ऐसा माना जाता है की सुहागिनों के द्वारा की गयी किसी भी पूजा का उनके गृहस्थ जीवन पर बड़ा असर पड़ता है।
केवल हिन्दू घर्म में ही नहीं वरन अन्य धर्मों में भी उनके पूजा आदि विधि पूर्ण किया जाता है ,परन्तु हिन्दू धर्म में ३३ करोड़ देवी देवता है ऐसा माना गया है ,हमारे यहाँ तो प्रतिदिन ही पूजनीय है ,इसीलिए सोमवार,मंगलवार,वीरवार,शुक्रवार ,शनिवार और रविवार का व्रत भी किया जाता है।
वट सावित्री की पूजा में स्त्रियां प्रातः स्नान आदि से निवृत होकर पकवान बनाती है और फिर बरगद के पेड़ के नीचे विधि पूर्वक पूजा संपन्न करने के उपरान्त ही जल ग्रहण करती हैं।
 पहले तो परिवार संयुक्तहोते थे तो काफी सारी गृहणियां एक साथ घर से पूजा करने के लिए निकलती थी और वो नज़ारा देखने के काबिल होता था पर अब तो  शहरों मैं सिमटे एकल परिवार और उनमें से कुछ तो शायद इस तरह के छोटे त्योहारों के नहीं भी करते हैं कुछ तो काम के कारण और कुछ पूजा के लिए सामिग्री उपलब्ध न होने के  कारण।
 हाँ छोटे शहरों में अभी भी वट सावित्री पूजा का बहुत महत्त्व भी है और इसे विधि पूर्वक मनाया जाता है -

विधान -----

            पूजा के लिए प्रातः काल स्नान आदि से निवृत होकर स्वछ वस्त्र पहन कर पूजा के लिए मीठी पूरी ,भीगा हुआ चना ,कच्चा सूत ,पुष्प ,धूप ,जल ,घी का दिया आदि एक थाली में रख कर बरगद के वृछ के नीचे बैठ कर पूजा की जाती है .
         बहुत सी जगह पर मीठी पूरी के साथ नमकीन पूरी व् मीठे बरगद भी बनाये जाते हैं ,

कथा -----

            प्राचीन काल में मद्र देश के राजा अश्वपति के सर्वगुण संपन्न कन्या थी ,जो सावित्री देवी की पूजा के पश्चात उत्पन्न हुई थी अतः उसका नाम सावित्री रखा गया । कन्या के युवा होने पर राजा में अपने मंत्री के साथ वर चुनने के लिए भेज दिया । जिस दिन सावित्री वर चुन कर दरबार में आई ,महर्षि नारद पधारे हुए थे । 
            जब नारद ने सावित्री से वर का नाम पूछा तो सावित्री ने बताया महाराज धुम्त्सेन ,जिनका राज्य छीन लिया गया और तथा जो अंधे हो चुके थे और दर- बदर घूम रहे हैं ,उनके के एकलौते पुत्र सत्यवान को मैंने अपने पति के रूप में  चुना है । 
           नारद जी ने अश्वपति को बधाई दी परन्तु एक बात और बताई की जब सावित्री बारह वर्ष की होगी तब इसके पति की म्रत्यु हो जाएगी ,तब राजा ने सावित्री को दूसरा वर चुनने को कहा ,परन्तु सावित्री ने कहा ,पिताजी मैं आर्य पुत्री हूँ जो जीवन में एक ही वर चुनती है । 
             विवाह हुआ ,सावित्री परिवार सहित जंगल में सास -ससुर की सेवा करते हुए जीवन व्यतीत करने लगी ,जब सावित्री बारह वर्ष की हुई ,उस दिन सत्यवान लकड़ी काटने जंगल में जाने लगे तब सावित्री ने भी साथ चलने को कहा ,
           जंगल में सत्यवान ने मीठे फल लाकर सावित्री को दिए और स्वयं लकड़ी काटने के लिए पेड़ पर चढ़ गए .थोड़ी ही देर में सत्यवान को सर में बहुत तेज़ दर्द हुआ और वो पेड़ से उतर कर आये और सावित्री की गोद में सर रखकर लेट गए ,थोड़ी ही देर में उनके प्राण पखेरू हो गये ,। 
            जब यमराज उनकी आत्मा को ले जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे हो चलीं ,यमराज ने कहा "पुत्री म्रत्यु के पश्चात जीवित मनुष्य स्वर्ग नहीं जाता ,अतः तुम वापस जाओ " इस पर सावित्री ने कहा ,"महाराज पत्नी क पतीत्व पति के साथ है ,अतः जहाँ पति जायेंगे वहीँ मैं भी जाउंगी " इस पर यमराज ने वर मांगने को कहा ---सावित्री ने सास- ससुर की खोयी नेत्र ज्योति का वर मांगा . यमराज ने तथास्तु कहा और आगे को चल पड़े । 
           सावित्री फिर भी उनके पीछे चलती रही ,यमराज ने पुनः वापस जाने को कहा परन्तु सावित्री की धर्मनिष्ठा देखकर पुनः वर मांगने को कहा ! सावित्री ने सास-ससुर को राज्य मिल जाये ,ऐसा वर मांगा ,यमराज ने पुनः तथास्तु !कहा और आगे चल दिए । 
       सावित्री  अभी भी उनके पीछे चल रही थी ,इस पर यमराज ने कहा पुत्री तुम विपरीत दिशा में वापस जाओ ,इस पर सावित्री बोली --"पति के बिना पत्नी के  जीवन की कोई सार्थकता नहीं है "इस पर यमराज ने पुनः वर मांगने को कहा ! सावित्री ने सौ पुत्रों की माँ होने का वर माँगा ,यमराज तथास्तु !कहकर आगे बढ़ चले । 
     अब भी सवित्री को पीछे आता देख यमराज ने झुंजला कर कहा पुत्री ,अब तो मैं तुम्हें मुंह मांगा वर भी दे चूका हूँ ,अब तो विपरीत दिशा में चली जाओ " इस पर सावित्री ने कहा :महाराज ! सौ पुत्रों की माँ बिना पति के कैसे बन सकती हूँ " यमराज ने उसकी पतिव्रता से प्रसन्न होकर सत्यवान को जीवन दान दे दिया ,और स्वयं वापस चले गए । 
            प्रसन्नचित सावित्री उसी जगह वापस आई जहाँ सत्यवान का मृत शरीर पड़ा था ,उसने बरगद के पेड़ की परिक्रमा की ,इसी के साथ सत्यवान भी जीवित हो उठे । सावित्री घर वापस आई सास- ससुर की नेत्रों की ज्योति वापस आ गयी ,उनका खोया राज्य भी मिल गया ,इस तरह सावित्री ने अपनी धर्मनिष्ठा ,विवेक से न केवल अपने पति का जीवन पाया अपितु जो भी खोया हुआ था प्राप्त किया । उसकी कीर्ति सारे संसार में फैल गयी । 

कथा के उपरान्त बरगद की परिक्रमा कच्चे धागे से करने के बाद सुहागिनें भीगा हुआ चना और बरगद के फल से अपने व्रत को तोड़ती हैं .


Thursday, May 22, 2014

भजन

                                                             भजन
हमें निज धर्म चलना सिखाती सिखाती रोज रामायण ,सदा शुभ आचरण करना  रामायण
१. जिन्हें संसार सागर से उतर कर पार जाना है ,
                                                      उन्हें सुख से किनारे पर लगाती रोज रामायण ,,,,हमें
२. कहीं छवि बिष्णु की बांकी ,कहीं शंकर की है झांकी
                                                        कहीं आनंद झूले पर झूलती रोज रामायण ---हमें
३. कभी वेदों के सागर में ,कभी गीता की गंगा में
                                                   कभी भक्ति सरोवर में डुबाती रोज रामायण ,,,हमें ----
४. सरल कविता के कुंजों में बना मंदिर है हिंदी का ,
                                                    पुजारी बिंदु से कविता मिलाती रोज रामायण ,हमें ------------

Monday, May 19, 2014

अपरा / अचला एकादशी व्रत पूजा



अपरा एकादशी ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है इसे अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है ,इस व्रत के करने से ब्रह्मा हत्या ,परनिंदा ,भूतयोनि जैसे निकृष्ट कर्मों से भी छुटकारा मिलता है। जो फल बद्रिकाश्रम में निवास करने से मिलता है और जो फल सूर्यग्रहण में कुरक्षेत्र में स्नान से मिलता है वह फल इस एकादशी के व्रत से मिलता है। 

इस वर्ष अपरा एकादशी का व्रत दिनांक २४ मई २०१४ को मनाया जायेगा। 

महत्व -----

इसके करने से कीर्तिपूर्ण तथा धन की प्राप्ति होती है ,यह व्रत मिथ्यावादियों,जालसाजियों ,कपटियों तथा ठगों के घोर पापों से मुक्ति दिलाने वाला होता है । 

पूजन विधि-----

इस एकादशी में मलयगिरि चन्दन ,तुलसी तथा कपूर से गंगा जल सहित  भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए ,कहीं-कहीं पर भगवान कृष्ण और बलराम  की पूजा भी की जाती है। 

कथा --------

प्राचीन कल में महीध्वज नाम का एक धर्मात्मा राजा था जिसका छोटा भाई बड़ा ही क्रूर और अधर्मी  था ,वह  अपने बड़े भाई के साथ द्वेष रखता था ,उस अवसरवादी पापिष्ट ने एक दिन रात्रि में बड़े भाई की हत्या करके उसकी देह को जंगली पीपल के वृक्ष के नीचे गाड़ दिया ,मृत्यु के उरान्त वह राजा प्रेतात्मा के रूप में पीपल पर निवास करने लगा ,वह बड़े ही उत्पात मचाता था। अचानक एक दिन धौम्य नामक ऋषि वहां से गुजरे ,उन्होंने तपोबल से प्रेत का उत्पात का कारण जाना तथा जीवन का वृतांत समझा। ऋषि ने प्रसन्न होकर उस प्रेत को पीपल से उतारा तथा परलोक विद्या का उपदेश दिया ,अंत में इस प्रेतात्मा  होने  इसे अचला एकादशी का व्रत करने को कहा ,इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से वह राजा दिव्य शरीर वाला होकर स्वर्ग में चला गया। 

                                इस दिन ककड़ी का सागर लिया जाना चाहिए 

  

Friday, May 2, 2014

अक्षय तृतीया



अक्षय तृतीया बैशाख माह की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है ,क्यों ,इस विषय में सभी लोग अलग-अलग कारण बताते हैं ,पर इसका जो वास्तविक  अर्थ है वह है कभी क्षीर्ण न होने वाला ,और इसका तृतीया शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है ,जिसका अर्थ है तीसरा ,और चन्द्र पंचांग के अनुसार इसका अनुमान लगाया जाता है। पौराणिक मान्यताओं में कहा गया है कि इस दिन शुरू किये गये कार्यों में अधिक से अधिक सफलता मिलने के संकेत मिलते है। इस महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिये विशेष अनुष्ठान किये जाते हैं ,इस दिन पंचांग देखे बिना ही कोई भी कार्य किया ज सकता है। इस दिन समस्त शुभ कार्य जैसे विवाह,गृह -प्रवेश ,पदभार,स्थान-परिवर्तन और स्वर्ण खरीदने जैसे कार्य किये जाते हैं भविष्य पुराण के अनुसार इस दिन सतयुग और त्रेता युग का आरम्भ हुआ था ,भगवान विष्णु के २४ अवतारों में से परशुराम,नर-नारायण तथा हयग्रीव ने अवतार लिया था। आज से ही बद्रीनाथ की  पट भी खुलते हैं। 

जब मीडिया का इतना प्रचार नही था तब भि अक्षय तृतीया मनाई जाती थी पर अब अखबारों  मेँ और टेलीविजन पर इतना प्रचार हो जाने के कारण सारे पर्व मनाने के लिये उत्साह अलग ही देखा जाता है। 

Monday, April 21, 2014

वरूथनी एकादशी व्रत महत्व ,पूजा,विधि



                                                                                                                                                                    वरूथनी एकादशी का व्रत बैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को किया जाता है ,पाण्डु पुत्र युधिष्ठिर ने जब श्रीकृष्ण से पुछा-" कि बैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को क्या कहते हैं" ,तब श्रीकृष्ण जी ने बताया कि इस एकादशी को बरूथनी एकादशी के नाम से जाना जाता है  । 

महत्व -------

कहा जाता है -जो मनुष्य इस एकादशी को पूर्ण श्रद्धा से इस व्रत को करते हैं उन्हें दस हजार वर्ष तप करने से जो फल मिलता है वो ही इस व्रत के प्रभाव से मिलता है ,कन्या दान से भी उत्तम इस व्रत का फल है ,जो फल कुरुक्षेत्र में स्नान से मिलता है वो ही इस व्रत के प्रभाव से मिलता है। 


व्रत की विधि-------


इस एकादशी के व्रत के के दिन पूर्व यानि की दशमी को रात्रि में सात्विक भोजन करना चाहिए साथ ही शयन के लिए धरती का उपयोग करना चाहिए ,व्रती को प्रातः स्नान से निवृत होकर पूजन सामिग्री एकत्रित करने के उपरांत धूप ,डीप और धान्य से पूजन करना चाहिए । 

कथा ----


प्राचीन समय में नर्मदा नदी के तट पर  राजा मान्धाता राज्य सुख को भोग रहे थे ,राजयकाज करते हुए भी राजन अत्यधिक दानशील और तपस्वी थे , एक दिन जब राजन तपस्या में लीं थे उसी समय एक जंगली भालू ने राजा का पैर काटना शुरू कर दिया और थोड़ी ही देर में वह राजा को जंगल में ले गया ,राजा घर गए और उन्होंने भगवान विष्णु की आराधना की और शीघ्र ही श्री विष्णु वहां प्रकट हो गए, और उन्होंने अपने चक्र से उस भालू को मार गिराया ,पर तब तक भालू उनका पैर तो खा ही चूका था जिसके कारण राजा बहुत चिंतित हुए।
भगवान वुशनु जी ने कहा तुम मथुरा में जाकर मेरी वराह अवतार की पूजा करो और वरूथनी एकादशी का व्रत करो। राजन ने पूर्ण शर्द्धा से इस व्रत को किया और वो पहले जैसे सुन्दर अंगों वाले हो गए । 


Monday, April 14, 2014

हनुमान जयन्ती /hanuman jayanti /मंगल को जन्मे मंगल करने वाले जय वीर हनुमान



हिन्दू पंचांग के अनुसार हनुमान जयंती प्रतिवर्ष चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है. मान्यता है कि इसी पावन दिवस को भगवान राम की सेवा करने के उद्येश्य से भगवान शंकर के ग्यारहवें रूद्र ने वानरराज केसरी और अंजना के घर पुत्र रूप में जन्म लिया था. यह त्यौहार पूरे भारतवर्ष में श्रद्धा व उल्लास के साथ मनाई जाती है. 

रामायण के अनुसार वे जानकी के अत्यधिक प्रिय हैं. इस धरा पर जिन सात मनीषियों को अमरत्व का वरदान प्राप्त है, उनमें बजरंगबली भी हैं. हनुमानजी का अवतार भगवान राम की सहायता के लिये हुआ. हनुमानजी के पराक्रम की असंख्य गाथाएं प्रचलित हैं.

वर्ष 2015 में हनुमान जयंती दिनांक 4 अप्रैल दिन शनिवार को पड़ रही है। 

हनुमान जी की उपासना का मन्त्र यह है -------

                    अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं                            दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् .                    सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं                             रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि..                    दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा.                             पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम् ..

इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है ---------

   अतुल बल के धाम ,सोने के पर्वत (सुमेरु )के समान कांतियुक्त शरीर वाले , दैत्यरूपी वन (को ध्वंश करने ) के लिए अग्निरूप ,ज्ञानियों में अग्रगण्य ,सम्पूर्ण गुणों के निधान, वानरों के स्वामी ,श्रीरघुनाथजी के प्रिय भक्त पवनपुत्र श्री हनुमान को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ जिनके दायीं ओर लक्ष्मण और बायीं ओर जानकी जी और साथ में हनुमान जी विराजमान हैं, उन रघुनाथजी की मैं वंदना करता हूँ ॥ 

दोहा -------

श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि.बरनऊँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार.बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार॥

दोहे का अर्थ इस तरह से है -------

श्रीगुरुजी के चरणकमलों की राज से अपने मन रुपी दर्पण को साफ़ करके मैं श्री रघुनाथजी के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ ,जो चारों फलों को ( धर्म ,काम,अर्थ,मोक्ष ) को देने वाला है ॥
क्तों की मन्नत पूर्ण करनेवाले पवनपुत्र हनुमान के जन्मोत्सव पर इनकी पूजा का बड़ा महातम्य होता है. आस्थावान भक्तों का मानना है कि यदि कोई श्रद्धापूर्वक केसरीनंदन की पूजा करता है तो प्रभु उसके सभी अनिष्टों को दूर कर देते हैं और उसे सब प्रकार से सुख, समृद्धि और एश्वर्य प्रदान करते हैं. इस दिन हनुमानजी की पूजा में तेल और लाल सिंदूर चढ़ाने का विधान है. हनुमान जयंती पर कई जगह श्रद्धालुओं द्वारा झांकियां निकाली जाती है, जिसमें उनके जीवन चरित्र का नाटकीय प्रारूप प्रस्तुत किया जाता है. यदि कोई इस दिन हनुमानजी की पूजा करता है तो वह शनि के प्रकोप से बचा रहता है.

श्री हनुमान चालीसा ----

Hanuman
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीस तिंहु लोक उजागर |
रामदूत अतुलित बल धामा अंजनि पुत्र पवन सुत नामा ||
महाबीर बिक्रम बजरंगी कुमति निवार सुमति के संगी |
कंचन बरन बिराज सुबेसा, कान्हन कुण्डल कुंचित केसा ||
हाथ ब्रज औ ध्वजा विराजे कान्धे मूंज जनेऊ साजे |
शंकर सुवन केसरी नन्दन तेज प्रताप महा जग बन्दन ||
विद्यावान गुनी अति चातुर राम काज करिबे को आतुर |
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया रामलखन सीता मन बसिया ||
सूक्ष्म रूप धरि सियंहि दिखावा बिकट रूप धरि लंक जरावा |
भीम रूप धरि असुर संहारे रामचन्द्र के काज सवारे ||
लाये सजीवन लखन जियाये श्री रघुबीर हरषि उर लाये |
रघुपति कीन्हि बहुत बड़ाई तुम मम प्रिय भरत सम भाई ||
सहस बदन तुम्हरो जस गावें अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावें |
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा नारद सारद सहित अहीसा ||
जम कुबेर दिगपाल कहाँ ते कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते |
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा राम मिलाय राज पद दीन्हा ||
तुम्हरो मन्त्र विभीषन माना लंकेश्वर भये सब जग जाना |
जुग सहस्र जोजन पर भानु लील्यो ताहि मधुर फल जानु ||
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख मांहि जलधि लाँघ गये अचरज नाहिं |
दुर्गम काज जगत के जेते सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ||
राम दुवारे तुम रखवारे होत न आज्ञा बिनु पैसारे |
सब सुख लहे तुम्हारी सरना तुम रक्षक काहें को डरना ||
आपन तेज सम्हारो आपे तीनों लोक हाँक ते काँपे |
भूत पिशाच निकट नहीं आवें महाबीर जब नाम सुनावें ||
नासे रोग हरे सब पीरा जपत निरंतर हनुमत बीरा |
संकट ते हनुमान छुड़ावें मन क्रम बचन ध्यान जो लावें ||
सब पर राम तपस्वी राजा तिनके काज सकल तुम साजा |
और मनोरथ जो कोई लावे सोई अमित जीवन फल पावे ||
चारों जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा |
राम रसायन तुम्हरे पासा सदा रहो रघुपति के दासा ||
तुम्हरे भजन राम को पावें जनम जनम के दुख बिसरावें |
अन्त काल रघुबर पुर जाई जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ||
और देवता चित्त न धरई हनुमत सेई सर्व सुख करई |
संकट कटे मिटे सब पीरा जपत निरन्तर हनुमत बलबीरा ||
जय जय जय हनुमान गोसाईं कृपा करो गुरुदेव की नाईं |
जो सत बार पाठ कर कोई छूटई बन्दि महासुख होई ||
जो यह पाठ पढे हनुमान चालीसा होय सिद्धि साखी गौरीसा |
तुलसीदास सदा हरि चेरा कीजै नाथ हृदय मँह डेरा ||









































                     दोहा ----- पवन तनय संकट हरन मंगल मूरति रूप |


                                                           राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ||

      आप सभी को हनुमान जयंती की बहुत-बहतु शुभकामनाएं ,,,,,,जय श्री राम 

Thursday, March 27, 2014

navratri shubhaarmbh /नवरात्री का शुभारम्भ 31 march 2014

दोस्तों ,इस वर्ष नवरात्री का शुभारम्भ दिनांक ३१ मार्च २०१४ को हो रहा है ,और हर वर्ष की भांति हम सभी अपने मंदिर में पूजन करने के लिए जाने की तैयारी में लग गए हैं.
फिर मैंने सोचा जाने से पूूर्व आप सभी के साथ नवरात्री की पूजा की विस्तृत जानकारी शेयर कर लूँ ,

नवबर्ष का आरंभ ------

भारतीय शास्त्र के अनुसार चैत्र मास    के शुक्ल पक्ष से नव वर्ष का आरम्भ होता है .ऐसा माना जाता है की इसी दिन ब्रह्मा जी ने स्रष्टि का सृजन किया था .कुछ लोग ऐसा मानते हैं की भारत के प्रतापी राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के संवत्सर का आरंभ भी इसी दिन से किया  था ,अतः इस दिन का दोनों ही द्रष्टि से बहुत महत्त्व है .ऐसी मान्यता भी है की इसी दिन भगवन विष्णु ने मतस्य अवतार लिया था ,

सवाल ये है की  इसी दिन से ही संवत्सर का आरंभ क्यों माना जाता है ---

१.तो पहली बात यह मानी जाती है की चैत्र मास  में ही वृक्ष और लताएं  नव पल्लवित होती हैं .
२. कहते हैं की माघ मास  में मधुरस पर्याप्त मात्रा में मिलता है ,मगर इसका कहीं भी स्पष्ट उल्लेख नहीं है ,इसलिए चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से ही नव वर्ष का आरम्भ माना गया है .

इसी दिन पंचांग की पूजा का भी विधान है 

,बहुत सारे घरों में पंडित के द्वारा पंचांग की पूजा कराकर संवत सुनकर  नव वर्ष का स्वागत किया जाता है ,मुझे याद है हमारे घर में भी हमारे पूज्य दादाजी भी इस पूजा का आयोजन करते थे उसके बाद पूज्य  पिताजी और फिर हमारे भाइयों ने भी इस प्रथा को आगे बढाया .
चैत्र मास की प्रतिपदा को गुडी पड़वा के रूप में भी हर्सौलास से मनाया जाता है ,सूर्य को अर्घ्य देकर नव वर्ष का स्वागत किया जाता है .


 नवरात्री साल में मुख्यतः २ बार  मनाई जाती हैं जिसमें एक चैत्र पक्ष की और दूसरी आश्विन पक्ष की .इन दोनों में ही सामान रूप से माँ दुर्गा और कन्या की पूजा का विधान है .नवरात्री पूजन प्रतिपदा से दशमी तक मनाई जाती  है ,ज्यादातर लोग नवमी को कन्या पूजन करके उपवास समाप्त करते हैं .
पूजन के स्थान की अच्छी तरह से सफाई करें और अगर सम्भव हो तो पूजा घर को पानी से घो लें .
सभी भगवान् के वस्त्र बदल दें .माता की मूर्ति या फोटो को साफ़ कर लें . अब सबसे पहले घट स्थापना की तैयारी करें .

पूजा के लिए जो भी स्थान नियत हो वो स्थान ,पहनने वाले वस्त्र हमेशा शुद्ध हों ,आसन काला नहीं होना चाहिए ,ऐसी मान्यता है की पूजन के लिए ऊन  का आसन सर्वोत्तम होता है ,कहते हैं की काठ के ऊपर बैठकर पूजा करने से निर्धनता आती है ,और पत्थर पर बैठ कर पूजा करने से रोग आते हैं ,अतः कोशिश  करनी चाहिए की पूजा का स्थान और आसन दोनों ही पवित्र हों .

घट स्थापना -----

  1.   १ कलश मिटटी का या फिर पीतल का 
  2.   जों बोने के लिए एक मिट्टी का पात्र .
  3.   जटा  वाला  नारियल  .
  4. पान के या अशोक के पत्ते ५ .
  5. साफ़ मिट्टी या रेता .
  6. चावल १ बड़ा चम्मच .
  7. एक गहरी कटोरी .
  8. रोली ,और मोली .
  9. रूपये .इछानुसार .
  10. जोँ  २ बड़े चम्मच 
  11. नारियल के लिए कपडा . 

विधि -------

  1. कलश को अच्छी तरह से धो कर उसमें साफ़  पानी भरें .
  2. अब मिट्टी के पात्र को भी पानी से धो लें . 
  3. इसमें मिट्टी भरें .
  4. अब इस मिट्टी  में जों को चारों  ऒर फैलाते हुए बो दें .
  5. इसके बीच में कलश को रखें और कलश के गर्दन में मोली को चारों ओर से लपेटें .
  6. कटोरी में चावल भरकर इसे  कलश के ऊपर रखें और कटोरी के नीचे पहले कलश में आम के पत्तों  को सजाते हुए लगायें ताकि इस कटोरी से ठीक से सेट हो जाएँ .
  7. अब रोली की सहायता से कलश पर स्वस्तिक बनाएं .
  8. नारियल पर कपडा और  मोली  बाँध कर इसे चावलों वाली कटोरी के ऊपर रखें ,
  9. नारियल पर रूपये चढ़ाएं .

पूजन का सामान -----

  1. माता की चुन्नी .
  2. रोली , मोली  ,
  3. साबुत सुपारी .९ 
  4. जायफल ९  
  5. पान के पत्ते  ९ .
  6. हवन  सामिग्री १ किलो .
  7. काले तिल १ ० ० ग्राम .
  8. चावल धुले हुए ५ ० ग्राम .
  9. पञ्च मेवा कटी हुई २ बड़े चम्मच .
  10. गुड़  २ बड़े चम्मच .
  11. बूरा   १ बड़ा चम्मच .
  12. देशी घी २ बड़े चम्मच .
  13. रुई .
  14. चावल पूजा के अक्षत के लिए  
  15. धूप  बत्ती .
  16. चौकी १ .
  17. बड़ा दिया १ .
  18.  लाल कपडा बिछाने के लिए १ मीटर .
  19. गूगल १ चम्मच .
  20. ताम्र कुंड  हवन के लिए 
  21. कपूर .
  22. लौंग .
  23. दिए के लिए तेल या घी .
  24. पुष्प .
  25. बताशे प्रशाद के लिए 
  26. जल का लोटा 
  27. हवन के लिए आम की लकड़ी .

विधि -------------

  1.  चोकी के ऊपर लाल वस्त्र बिछाकर माता को चुन्नी उढ़ाकर  विराजित करें .
  2. हवन सामिग्री में गूगल ,मेवा,चावल,तिल ,जों, देशी घी ,बूरा,गुड़ को अच्छी तरह से मिलाकर सामिग्री को तैयार करें .
  3. अब माता के उत्तर पूर्व में घट रखें ,और दिए में घी या तेल सामर्थ्य के अनुसार भर कर और माता के समक्ष रखें .
  4. थाली में रोली,मोली ,चावल ,धूप बत्ती ,लौंग ,कपूर ,पुष्प ,बताशे रखें।

पूजन की विधि -----------

  1. आसन को बिछा कर बैठें और माँ का ध्यान करें .
  2. जल से आचमन करें,अब माता को स्नान कराएं  ,पुष्प समर्पित करें ,
  3. टीका करें ,दिया प्रज्व्व्लित करें और फिर माता की आराधना करें 
  4. आराधना में माता की स्तुति ,चालीसा पाठ  और आरती करें .
  5. अब हवन के लिए कुंड में लकड़ी लगाकर कपूर से प्रज्वलित करें और सभी लोगों को सामान भाग से सामिग्री दे कर हवन शुरू करें .
  6. हवन करने के बाद प्रशाद ,पान चढ़ाएं .
  7. हवन के लिए या तो पंडित बुलाकर हवन कराएं या फिर स्वयं करें ,स्वयं हवन करने के लिए मन्त्र किसी पंडित से पूँछ कर ही करें ,अन्यथा न करें .
  8. अंत में सबको प्रशाद बांटें .

उपवास ---

  1.    नवरात्री मे अधिकतर लोग उपवास रखते हैं ,अगर आप ९ दिनों का व्रत नहीं रख सकते हैं तो पहला और आखिरी  यानि की प्रतिपदा और अष्टमी का व्रत रखें .
  2. उपवास में फल ज्यादा खाएं और पानी भी लगातार पियें  ताकि शरीर में पानी की कमी न हो .
  3. व्रत ,उपवास शरीर के क्षमता के अनुसार ही रखना चाहिए . 
  4. नवरात्रि में माता का कीर्तन अवश्य करें ,ऐसी मान्यता है की यदि माता के छंद  नहीं गए जाते है तो माता एक पैर से खड़ी रहती हैं .
  5. संभव हो सके तो माता के मंदिर भी जायें . 

माँ दुर्गा के ९ रूपों की पूजा का विधान नवरात्री में है,और माँ के ९ रूपों की व्याख्या इस प्रकार है  -----

  1. प्रथम हैं माँ शैलपुत्री ,हिमालय पुत्री होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा .
  2. नवरात्री के दुसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी   की पूजा का विधान है ,तप और जप करने के कारन इनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा  .
  3. माँ चंद्रघंटा की पूजा नवरात्री की तीसरे दिन की जाती है ,इस रूप में माँ के मस्तक पर अर्धचन्द्र बना है अतः इस रूप को चंद्रघंटा कहते हैं .
  4. चतुर्थी को माँ कूष्मांडा की अर्चना का विधान है .ऐसा कहा जाता है मंद हंसी के द्वारा माँ ने ब्रम्हांड को उत्पन्न किया .इसलिए इन्हें कुष्मांडा  कहा जाता है 
  5. चार भुजाओं वाली माँ स्कंदमाता की अर्चना पंचमी को की जाती है .
  6. जिनकी उपासना से भक्तों के रोग ,शोक ,भय ,और संताप का विनाश होता है ऐसी माँ कात्यायनी की उपासना छठे दिन की जाती है .
  7. काल से रक्षा करने वाली देवी कालरात्रि की उपासना सातवें दिन की जाती है .
  8. शांत रूप वाली ,भक्तों को अमोघ फल देने वाली देवी महागौरी की पूजा आठवें दिन की जाती है .
  9. भक्तों की  समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली देवी सिध्दात्री की पूजा नवें दिन की जाती है .

 ऐसा माना जाता है की ,नवराति में माँ की आराधना करने में सबसे पहले माता के १ ० ८ नामों के पढना चाहिए ,जो इस तरह हैं ---------

  1. सती .
  2. साध्वी .
  3. भवप्रीता .
  4. भवानी  
  5. भवमोचनी .
  6. आर्या .
  7. दुर्गा .
  8. जया .
  9. आध्रा .
  10. त्रिनेत्रा .
  11. शूलधारिणी .
  12. पिनाकधारिणी .
  13. चित्रा .
  14. चंद्रघंटा .
  15. महातपाः .
  16. मनः .
  17. बुद्धिः .
  18. अहंकारा .
  19. चित्तरूपा .
  20. चित्ता 
  21. चितिः  
  22. सर्वमंत्रमयी .
  23. सत्ता .
  24. सत्यान्द्स्वरूपिनी .
  25. अनंता .
  26. भाविनी .
  27. भाव्या .
  28. भव्या .
  29. अभव्या .
  30. सदागति .
  31. शाम्भवी .
  32. देवमाता .
  33. चिंता .
  34. रत्नप्रिया .
  35. सर्वविद्या .
  36. दक्ष  कन्या 
  37. दक्ष यग्यविनाशिनी 
  38.  अपर्णा .
  39. अनेकवर्णा .
  40. पाटला .
  41. पाटलावती .
  42. पट्टाम्बर परिधाना .
  43. कल्मंजीर्रंजनी .
  44. अमेयविक्रमा .
  45. क्रूरा .
  46. सुंदरी .
  47. सुरसुन्दरी .
  48. वनदुर्गा .
  49. मातंगी .
  50. मतंग्मुनिपूजिता .
  51. ब्राह्मी .
  52. माहेश्वरी .
  53. ऐन्द्री .
  54. कौमारी .
  55. वैष्णवी .
  56. चामुंडा .
  57. वाराही .
  58. लक्ष्मी .
  59. पुरषा कृति  .
  60. विमला .
  61. उत्कार्शनी 
  62. ज्ञाना  .
  63. क्रिया .
  64. नित्या .
  65. बुद्धिदा .
  66. बहुला .
  67. बहुलप्रेमा 
  68. सर्ववाहन वाहना .
  69. निशुम्भ्शुम्भ्हन्नी .
  70. महिशाशुर मर्दिनी .
  71. मधुकैटभ हननी .
  72. चंड मुंड विनाशिनी .
  73. सर्व असुर विनाशा .
  74. सर्वदानव घातिनी .
  75. सर्वशात्र्मायी .
  76. सत्या .
  77. सर्वाशास्त्र्धरिणी .
  78. अनेकाश्त्र हस्ता  
  79. अनेकाश्त्र धारिणी .
  80. कुमारी .
  81. एक कन्या .
  82. कैशोरी .
  83. युवती .
  84. यति .
  85. अप्रोढ़ा .
  86. प्रोढा .
  87. वृद्ध माता .
  88. बलप्रदा .
  89. महोदरी .
  90. मुक्तकेशी .
  91. घोररूपा .
  92. महाबला .
  93. अग्निज्वाला .
  94. रौद्रमुखी .
  95. कालरात्रि .
  96. तपस्वनी .
  97. नारायणी .
  98. भद्रकाली .
  99. विष्णुमाया .
  100. जलोदरी .
  101. शिवदूती .
  102. कराली .
  103. अनंता .
  104. परमेश्वरी .
  105. कात्यायनी .
  106. सावित्री .
  107. प्रत्यक्षा .
  108. ब्रह्मवादिनी .
देवी के नामों का जो प्रतिदिन पाठ करता है उसके लिए तीनों लोकों में कुछ भी असाध्य नहीं है .
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अब  माता की सप्तसती मन्त्रों से पूजा अर्चना आरम्भ की जानी चाहिए ,जो इस प्रकार से है ----------



  1. देवी प्रप्न्नाति हरे प्रसीद प्रसीद मार्त जगतो अखिलस्य ,प्रसीद विश्वेश्वरी पाहि विश्वं त्वमीश्वरी चराचरस्य .
  1. सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके  ,शरण्ये त्रयम्बिके नारायणी नमोस्तुते । 
  1. देवी त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्य विधायिनी ,कलोहि  कार्य सिद्धर्थ्य मुयाम ब्रूह यत्नतः .
  1. ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी  भगवती हि सा , बलादा कृष्य  मोहाय महामाया प्रयक्षति । 
  1. दुर्गे स्मरता हरसि भीतिमशेष  जन्तोः ,स्वस्थे स्मरता मतिमतीव शुभां ददासि । 
  1. दारिद्य दुःख भय हारिणी का त्वन्द्या ,सर्वोपकार करनाय सदार्द चिता । शरणागत दीनार्त परित्राण परायने ,सर्व्स्यार्ति हरे नारायणी नमोस्तुते । 
  1. सर्वस्वरूपे सेर्वेषे सर्वशक्ति समन्विते ,भयेभ्यस्त्राहि नो देवी दुर्गे नमॉस्तुते । 
  1.  रोगान शेशान  पहन्सि तुष्टा ,रुष्टा तू कामान सक्लांभिशितान । त्वं आश्रीतानाम न विपिन्नरानाम ,त्व्माश्रिता ह्याश्रिता प्रयन्ति  '
  1. सर्वबाधा प्रस्मनम त्रैलोकश्य अखिलेश्वरी ,एवमेव त्वया कार्यमस्द्वैरी  .विनाशं । 
            प्रतिदिन माँ दुर्गा के संक्षिप्त स्तुति सम्पूर्ण कार्य और मनोरथ पूर्ण करने वाली है ।  

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                      तत्पचात माँ का कीलक स्त्रोत का पाठ किया जाना चाहिए -------

महर्षि मार्कण्डेय जी बोले -----
कल्याण प्राप्ति हेतु निर्मल ज्ञानरूपी शरीर धारण करने वाले दिव्य नेत्रों वाले ,तथा मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करने वाले भगवन शिव जी! को नमस्कार है 
,इस धरा पर जो मनुष्य इस कीलक मन्त्र को जानने वाला है वाही कल्याण को प्राप्त करता है । जो केवल सप्तशती से ही देवी की स्तुति करता है उसे इस कीलक से देवी की सिद्धि हो जाती है ।देवि की सिद्धि  के लिए दूसरी साधना की आवश्यकता नहीं रह जाती ,लोगों के मन में आशंका थी की केवल सप्तशती   के मन्त्रों की उपासना अथवा अन्य मन्त्रों की उपासना से भी सामान रूप से सब कार्य सफल हो जाते हैं तो इनमें से कौन सा साधन श्रेष्ठ है । 
         इन सभी शंकाओं को लेकर भगवन शंकर ने अपने सामने आये भक्तों को समझते हुए कहा---- सप्तशती नामक सम्पूर्ण स्त्रोत कल्याण को देने वाला है और तभी भगवन शंकर ने माँ के सप्तशती नामक स्त्रोत को गुप्त कर दिया । इसलिए मनुष्य इसको बड़े पुण्य  से प्राप्त करता है । 
जो भी मनुष्य अष्टमी को या कृष्ण पक्ष की चतुर्दसी को देवी को अपना सर्वस्व  समर्पित कने के पश्चात् उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करता है ,उस पर माँ दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं,अन्यथा नहीं  । इस प्रकार शिव जी द्वारा इस स्त्रोत को कीलित किया गया है ,और जो पुरुष इस स्त्रोत को निश्कीलित करके नित्य प्रति पाठ करता है ,वह सिद्ध हो जाता है और वही गंधर्व होता है । 
इस संसार में सर्वत्र विचरते हुए भी उस मनुष्य को भय नहीं रहता म्रत्यु के पश्चात मोक्ष प्राप्त करता है । किन्तु इस कीलक की विधि को जानकार ही सप्तसती का पाठ करना चाहिए । कीलन  और निष्कीलन के ज्ञान के पश्चात यह स्त्रोत निर्दोष हो जाता है । ऐसा कहा जाता है , की स्त्रियों में जो सौभाग्यहैं ,इसी पाठ की कृपा स्वरूप हैं । 
         इस स्त्रोत का पाठ उच्च स्वर में करने से ही की जानी चाहिए । उस देवी की स्तुति अवश्य की जानी चाहिए जिसके प्रसाद स्वरूप सौभाग्य ,आरोग्य ,सम्पत्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है । 
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              इसके उपरांत अर्गला स्त्रोत का पाठ करना चाहिए जो इस प्रकार है --------------

जयंती ,मंगला ,काली ,भद्रकाली,कपालिनी ,दुर्गा ,क्षमा ,शिव,धात्री स्वाहा ,स्वधा इन रूपों में प्रसिद्ध माँ तुमको नमस्कार है ..

  1. सब जगह व्याप्त प्राणियों के दुःख हरने वाली माँ !कालरात्रि तुम्हें नमस्कार है ,मधुकैटभ का नाश करने वाली माँ ब्रह्मा जी को वर देने वाली माँ तुम मुझे रूप दो जय दो और काम क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करने वाली माँ तुमको मेरा नमस्कार है .। 
  2. महिषासुर मर्दिनी माँ! भक्तों को सुख देने वाली तुमको नमस्कार हो ,तुम मुझे रूप दो के दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो .। 
  3. रक्तबीज का वध करने वाली ,माँ !चंड मुंड विनाशिनी ,तुम मुझे रूप,जय दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो .। 
  4. शुम्भ-निशुम्भ का मर्दन करने वाली हे देवी! मुझको स्वरूप दो ,जय दो और मेरे काम,क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो .। 
  5. हे सम्पूर्ण सोभाग्य  को देने वाली !,पूजित युगल चरणों वाली माँ तुम मुझे रूप दो ,यश दो ,मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  6. तुम सब शत्रुओं का नाश करने वाली! हो ,तुम्हारे रूप और चरित्र अमित हैं ,मुझे रूप दो ,यश दो और काम क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो । 
  7. इस संसार में जो भक्ति से तुम्हारी पूजा करते हैं सबके पापों का नाश करने वाली माँ !तुम उन सबको रूप और यश दो और उनके शत्रुओं का नाश करो । 
  8. माँ रोगों का नाश करने वाली जो भी भक्त तुम्हारी पूजा भक्ति पूर्वक करते हैं उनको रूप और जय दो ,उनके शत्रुओं का नाश करो । 
  9.  हे देवी! माँ मुझे सोभाग्य और आरोग्य दो मुझे रूप दो जय दो और मेरे काम,क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो । 
  10. हे माँ ! जो मुझसे बैर रखते हैं उनका नाश करके मेरा बल बढाओ ,मुझे रूप,जय दो मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  11. माँ! मेरा कल्याण करके मुझे उत्तम सम्पत्ते प्रदान करो ,मुझे रूप दो जय दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो ।  
  12. देवताओ और राक्षसों के मुकुटों द्वारा स्पर्श किये चरणों वाली माँ !अम्बे मुझे स्वरूप ,जय दो ।  
  13. हे देवी! अपने भक्तों को विद्वान ,लक्ष्मीवान और कीर्तिमान बनाकर उन्हें रूप और जय दो ,उनके शत्रुओं का नाश करें । 
  14. हे देवी ! प्रचंड दैत्यों के मान का नाश करने वाली चण्डिके !मुझे रूप दो जय दो ,और मेरे काम क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो .
  15. हे माँ ! चार भुजाओं वाली परमेश्वरी !मुझे रूप ,जय दो मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  16. विष्णु से सदा स्तुति की हुई माँ ! हिमालय कन्या पारवती के भगवान् शंकर से स्तुति की गयी माँ ,मुझे रूप दो जय दो ,और मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  17. इंद्र द्वारा सद्भाव से पूजित माँ! तुम मुझे रूप दो जय दो और मेरे काम क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो ।  
  18. प्रचंड ,भभुदंड से दैत्यों का दमन करने वाली माँ !मुझे रूप दो ,यश दो ,मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  19. हे देवी! तुम अपने भक्तों को असीम आनंद देने वाली हो ,मुझे रूप ,जय दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो 
  20. मेरी इच्छानुसार  चलने वाली सुंदर पत्नी प्रदान करो ,माँ ! जो संसार सागर से तारने वाली हो और उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो .        

 जो मनुष्य इस महा स्त्रोत का पाठ करता है वह श्रेष्ठ फल प्राप्त करता है और प्रचुर धन भी प्राप्त करता है .

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दोस्तों में एक विशेष स्तुति माता की करती हूँ और आप सभी के साथ इसे बांटना चाहती हूँ ,माँ की ये स्तुति समस्त सुखों को  देने वाली है ------

   हे सिंघ्वहिनी  जगदम्बे तेरा ही एक सहारा है --------

  1. मेरी विपदाएं दूर करो ,करुणा की द्रष्टि  इस ओर करो । संकट के बीच घिरा हूँ माँ आशा से तुम्हें पुकारा है .
  2. कुमकुम ,अक्षत और पुष्पों से नैवेध धूप और अर्चन से । नित तुम्हें रिझाया करती हूँ क्यों अब तक नहीं निहारा है .
  3. जब-जब मानव पर कष्ट पड़े तब-तब तुमने अवतार लिया । हे कल्याणी ! हे रुद्राणी ,इन्द्राणी रूप तुम्हारा है .
  4. भाव -बाधाएं हरने वाली जन-जन की बाधाएं हरती हो । मेरी भी बाधाएं हरना जग जननी नाम तुम्हारा है .
  5. कौमारी ,सरस्वती हो तुम ,ब्रम्हाणी तुम वैष्णवी हो ।कर शंख चक्र और पुष्प लिए लक्ष्मी भी रूप तुम्हारा है .
  6. मधुकैटभ सा दानव मारा और चंड मुंड को चूर किया ।हे महेश्वरी ,महामाया चामुंडा रूप तुम्हारा है .
  7. धूम्रलोचन को तुमने मारा ,महिषासुर तुमने  संहारा है । हे सिंघ्वाहिनी !अष्टभुजी नवदुर्गा रूप रुम्हारा है .
  8. था शुम्भ-निशुम्भ असुर मारा और रक्तबीज का रक्त पिया । हे शिवदूती! हे गौरी माँ काली भी रूप तुम्हारा है .
  9. जब वैश्य -सुरथ ने तप करके अपना तन तुम्हें चढ़ाया था । दर्शन दे जीवनदान दिया ज्योतिर्मय रूप तुम्हारा है .
  10. तेरी शरणागत में आकर तेरी ही महिमा को गाकर ।माँ ! सप्तशती के मन्त्रों से भक्तों ने तुहें पुकारा है .

                  हे सिंघ्वाहिनी जगदम्बे तेरा ही एक सहारा है  ---------------------

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इस प्रकार से आप सभी नवरात्री की पूजा कि शरुआत करें ,अगले अंक में आप सबके साथ मैं माँ के नौं रूपों की व्यख्या करुँगी । 


Monday, March 24, 2014

पापमोचनी एकादशी /papmochni ekadashi /27 Mrach 2014

एकादशी का व्रत रखने से या कथा सुनने मात्र से ही मनुष्य कई प्रकार के कष्टों से मुक्ति पा लेता है ,पापमोची एकादशी चैत्र माह के कृष्ण पक्ष को मनायी जाती है। इस दिन भगवान् विष्णु को अर्घ्यदान देकर पूजा कि जाती है ,तत्पचात धूप -दीप,चन्दन आदि के द्वारा नीरंजना करनी चाहिए। 

प्राचीन समय की बात है, चित्ररथ नाम का एक वन था. इस वन में गंधर्व कन्याएं और देवता सभी विहार करते थें. एक बार मेधावी नामक ऋषि इस वन में तपस्या कर रहा था. तभी वहां से एक मंजुघोषा नामक अप्सरा ऋषि को देख कर उनपर मोहित हो गई. मंजूघोषा ने अपने रुप-रंग और नृ्त्य से ऋषि को मोहित करने का प्रयास किया. उस समय में कामदेव भी वहां से गुजर रहे थें, उन्होने भी अप्सरा की इस कार्य में सहयोग किया. जिसके फलस्वरुप अप्सरा ऋषि की तपस्या भंग करने में सफल हो गई.कुछ वर्षो के बाद जब ऋषि का मोहभंग हुआ, तो ऋषि को स्मरण  हुआ कि वे तो शिव तपस्या कर रहे थें. अपनी इस अवस्था का कारण उन्होने अप्सरा को माना. और उन्होने अप्सरा को पिशाचिनी होने का श्राप दे दिया. शाप सुनकर मंजूघोषा ने कांपते हुए इस श्राप से मुक्त होने का उपाय पूछा. तब ऋषि ने उसे पापमोचनी एकादशी व्रत करने को कहा. स्वयं ऋषि भी अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिये इस व्रत को करने लगें. दोनों का व्रत पूरा होने पर, दोनों को ही अपने पापों से मुक्ति मिली.
तभी से पापमोचनी एकादशी का व्रत करने की प्रथा चली आ रही है. 

यह व्रत व्यक्ति के सभी जाने- अनजाने में किये गये पापों से मुक्ति दिलाता है. 

कबीर दास जी ने कहा है------

                  पर नारी पैनी छुरी,मत कई लगो अंत,रावण के दश सर गधे,पर नारी संग । 

                 एक कंचन एक कामिनी दुर्गम घाटी दोय,इन दोनों को पारकर श्रेय लई कोई कोय ॥       


Saturday, March 22, 2014

bhajan




                 भगवान् को ढूँढन मैं निकली वो यहाँ मिले न वहाँ मिले -२ 


१. गंगा ढूंढी ,यमुना ढूंढी ,मैंने ढूंढ लई सरयू सारी -२ 

                                      मैंने ढूंढ लई सरयू सारी ,वो यहाँ मिले न वहाँ मिले ---

२. मंदिर ढूंडा ,मस्जिद ढूंढी ,मैंने ढूंढ लई गिरिजा सारी -२
                                      मैंने ढूंढ लई गिरिजा सारी ,वो यहाँ मिले न वहाँ मिले ---

३. काशी ढूंढी ,मथुरा ढूंढी मैंने ढूंढ लई गोकुल सारी -२      
                                     मैंने ढूंढ लई गोकुल सारी ,वो यहाँ मिले न वहाँ मिले ---

४. जब अंतर्मन में जोत जली ,तब सतगुरु ने उपदेश दिया -२
                                     तब सतगुरु ने उपदेश दिया ,मन मंदिर में भगवान् मिले ---


Thursday, March 20, 2014

बासेड़ा या बसोड़ा




होली के सात या आठ दिन बाद बासेड़ा चैत्र के कृष्ण पक्ष में सोमवार या वीरवार को मनाया जाता है ,इस दिन शीतला माता की पूजा का विधान है।
जैसा कि नाम से ही अर्थ समझ आता है बसेड़ा यानि कि बासी भोजन ,तो इस पूजा के लिए एक दिन पहले रात्रि में ही सोंठ और गुड से गुझिया बनायीं जाती है जिसे पिढ़कुली कहा जाता है साथ ही बाजरा भी रखा जाता है ,पूजन की थाली में रोली,चावल,दही ,चीनी धूपबत्ती आदि रख कर इसे घर के सभी सदस्यों से हाथ लगाकर फिर शीतला माता की पूजा कि जाती है ।
इस दिन बसी भोजन किया जाता है यदि सब लोग बासी भोजन न कर सकें तो पूजा करने वाले व्यक्ति को तो अवश्य ही बसी भोजन ही खाना चाहिए । 

इस पूजा की कथा इस प्रकार है ----------

     एक गांव में एक बुढ़िया रहती थी,वह  बसेढे के दिन शीतला माता की पूजा करती थी और ठंडी रोटी यानि कि बासी भोजन करती थी ,उसके गांव में और कोई भी इस पूजा को नहीं करता था ।
एक दिन  गांव में आग लग गयी और बुढ़िया के अतिरिक्त सभी की झोपडी जल गयीं ,इससे सभी को बहुत आश्चर्य हुआ ,सब ने बुढ़िया से इसका कारण पुछा तब ने बताया कि बासेढे के दिन ठंडी रोटी खाती थी और शीतला माता की पूजा करती थी और तुम सभी नहीं करते थे इसीलिए ऐसा हुआ है ।
और अभी से गांव के सभी लोग इस पूजा को विधिविधान से करने लगे ।
इस दिन घर में नीम लाकर टांगना भी शुभ माना जाता है । अब इस पूजा का चलन लगभग समाप्त सा हो रहा है परन्तु अभी भी उत्तर प्रदेश में इसे बहुत से घरों में मनाया जाता है ,कुछ लोग शीतला माता के दर्शन होली वाले दिन रंग खेलने के बाद ही करते हैं और तब कोई काम शुरू करते हैं ,माँ शीतला को बताशे का प्रसाद चढ़ाया जाता है ॥ 

इसकी एक कथा इस प्रकार है -----

  एक राजा की सात बेटी थीं ,रानी रोज भोजन बनाती औ जब राजा और रानी खाने के लिए बैठते तब उसमें केवल एक ही रोटी रह जाती दोनों बाँट कर खा लेते ,अंत में दुखी होकर उन्होंने एक युक्ति सोची ,अपनी बेटियों को मामा के घर ले जाने के बहाने उन्हें जंगल में छोड़ कर अपनी टोपी पेड़ पर तंग कर घर आ गए। 
सातों बहने जंगल में भटकती -भटकती अपने गधों पर सवार एक गांव में आ गयीं वहाँ उन्होंने अपने गधों के वास्ते कुंए पर पानी भर रही महिलाओं से पानी पिलाने को कहा , परन्तु उस गांव में लगभग सभी के घरों में माता (चेचक) निकली थी और ऐसे में कोई किसी को कुछ भी खिलाता पिलाता नहीं है। 
उन महिलाओं  ने पानी पिलाने से मना कर दिया तब उन सातों बहनों ने कहा -"आप हमारे गधों को पानी पिलाएं और नहलाएं ताकि वो खुश होकर जमीन पर लोटने लगें और तब आप सभी इनके नीचे की गीली मिट्टी को अपने बच्चों के तन पर लेप लगा दें वो ठीक हो जायेंगे "
तब उन औरतों ने ऐसा ही किया और उनके बच्चे ठीक हो गए। उस राजा के पुत्र को भी माता निकली थीं और जब यह बात राजा तक पहुंची और तब उन्होंने उन लोगों से पूछा कि कैसे आप सभी के बच्चे ठीक हो गए । 
तब उन सभी ने सविस्तार बताया ,राजा ने सातों बहनों तक संदेशा भिजवाया परन्तु उन बहनों ने आने से मना कर दिया ,और कहा की जब राजा और रानी स्वयं भोजन बनाएंगे और यज्ञ करेंगे तब हम वहाँ आकर भोग लगाएं। 
राजा और रानी ने ऐसे ही किया परन्तु क्योंकि भोग देशी घी में बना था इसलिए उन्होंने भोग लगाने से इंकार कर दिया ,फिर सारा भोग तेल में बनाया गया तब उन बहनों ने भोग लगाया और पूजन किया और उस प्रसाद से राजा का बीटा भी ठीक हो गया । और इस तरह इस बासेढे की पूजा का विधान आरम्भ हुआ ॥ 

ऐसा माना जाता है कि वो सातों बहने देवी का सवरूप थीं ॥ 


Thursday, March 13, 2014

होली पर्व

होली का पर्व हिदू धर्म में बहुत ही महत्व पूर्ण है ,फाल्गुन माह की पूर्णिमा को होलिका दहन होता है तत्पचात एकम को रंग खेला जाता है ,फागुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक आठ दिन होलाष्टक मनाया जाता है ,पुराणों के अनुसार ऐसी भी मान्यता है कि जब भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था, तभी से होली का प्रचलन हु‌आ।परन्तु सर्वाधिक प्रसिद्ध कथा भक्त प्रहलाद की है । 

कथा इस प्रकार है --

        जिस समय हिरणकश्यप अपने पुत्र की प्रभु  भक्ति से खिन्न रहता था और उसे तरह-तारह से प्रताड़ित करके मरवाने की कोशिश में असफल होने के बाद अपनी बहन को बुलवाया ,हिरण्यकश्यप कि बहन को  अग्नि का वरदान था और उसे एक दुशाला मिली थी जिसे पहन कर यदि अग्नि में भी बैठ जाये तो भी भस्म नहीं होगा ,उसका नाम होलिका था ,तब उसने भाई हिरण्यकश्यप से कहा मैं पुत्र प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठ जाउंगी ताकि वह जलकर भस्म हो जाए , भगवान् की कृपा से व दुशाला उड़ कर भक्त प्रह्लाद के ऊपर आ गिरी और होलिका भस्म हो गयी और तभी से होली का त्यौहार मनाया जाने लगा । 


होलिका दहन में गोबर के बड़कुल्ले ,गेहूं की बाली ,और मिष्ठान आदि से पूजा करने के पश्चात रंगों से होली खेली जाती है । 


पूर्व में तो आजकल की तरह रंग नहीं मिलते थे तब अधिकतर टेसू के फूलों से रंग बनाकर खेला जाता था और सचमुच वो बहुत ही खूबसूरत रंग होते थे । 

होली में सभी एक दुसरे से गले मिलकर द्वेश भावना मिटा लेते हैं ,होली में रंग खेलने के बाद होली मिलने का भी चलन है जो आजकल की भागदौड़ की जिंदगी में लगभग समाप्त होता जा रहा है पर छोटे शहरों में आज भी यह प्रथा जीवित है ,एक दुसरे से सौहार्द का त्यौहार महंगाई की मार से सूना होता जा रहा है ,अब तो बाजार भी सूनी रहने लग गयीं हैं । 

दिन वो भी क्या थे जब घरों में महकते थे पकवान और बाजार भी खिली सी रहती थीं ,दोस्तों आज तो अपनों को ही बुलाना दुश्वार हो गया है ऐसी मार मंहगाई मार रही है ॥ 


ऐसी मान्यता है कि जली हु‌ई होली की गर्म राख घर में समृद्धि लाती है। साथ ही ऐसा करने से घर में शांति और प्रेम का वातावरण निर्मित होता है।