Tuesday, February 25, 2014

महाशिवरात्रि पूजा ,कथा ,

वर्ष २०१४ में महाशिवरात्रि दिन वीरवार दिनांक २७ फरवरी को पड़ रही है ,,आशा करती हूँ सभी भक्तजन पूर्ण श्रद्धा के साथ इस पर्व को मनाएंगे ,यहाँ इसकी पूजन विधि और कथा प्रस्तुत है --------

फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महा शिवरात्रि का महोत्स्व धूमधाम से मनाया जाता है ,त्रियोदशी को एक बार भोजन करके चतुर्दशी को दिन भर अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए  .
इस दिन काले तिलों से स्नान करने के उपरान्त रात्रि में विधिवत शिव जी की पूजा की जानी चाहिए ,शिव जी कू सबसे अधिक प्रिय फूल हैं ---मंदार ,कनेर,बेलपत्र, तथा मौलिगिरी ,यदि ये पुष्प उपलभ्द्ध न हों तो केवल सदाबहार के पुष्पों से भी पूजा की जा सकती है।
शिव जी की पूजा में बेल पात्र का विशेष महत्त्व माना गया है ,शिवलिंग पर चढ़ाये गए पुष्प ,फल आदि को ग्रहण नहीं किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त शिव जी को दूध ,दही ,शहद ,चीनी और घी से शिवाभिषेक भी किया जाना चाहिए।
शिवरात्रि में शिवाभिषेक करने से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है ,इस दिन अभिषेक करने से घर का पितृ दोष भी समाप्त होता है तथा घर के समस्त वास्तु दोषों का भी निवारण होता है। 

कथा--------

एक बार पार्वती ने भगवान शिवशंकर से पूछा, ‘ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा को सरलता पूर्वक  प्राप्त कर लेते हैं?’उत्तर में शिवजी ने पार्वती को ‘शिवरात्रि’ के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई-                    ‘एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी ने अगले दिन सारा ऋण लौटाने  का वचन दिया और  बंधन से छूट गया।

अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला।पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए।एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, ‘मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना।’ शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई।कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, ‘हे पारधी ! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।’शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली , उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, ‘हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मार।’शिकारी हँसा और बोला, ‘सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।’उत्तर में मृगी ने फिर कहा, ‘जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।’मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्व करेगा।शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,’ हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।’मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, ‘मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।’उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई।  उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।

इस पर स्वर्ग लोक से देवताओं ने व्याघ की सराहना की तथा भगवान् शंकर ने पुष्प विमान भेजकर उस बहेलिये तथा मृग परिवार को शिवलोक  का अधिकारी बना दिया 


शिव जी की आरती ---------

ॐ जय शिव ॐकारा, स्वामी हर शिव ॐकारा |
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अर्धांगी धारा || – ॐ जय शिव ॐकारा
एकानन चतुरानन पंचानन राजे, स्वामी पंचानन राजे |
हंसासन गरुड़ासन वृष वाहन साजे || – ॐ जय शिव ॐकारा
दो भुज चारु चतुर्भुज दस भुज से सोहे, स्वामी दस भुज से सोहे |
तीनों रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे || – ॐ जय शिव ॐकारा
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी, स्वामि मुण्डमाला धारी |
चंदन मृग मद सोहे भाले शशि धारी || – ॐ जय शिव ॐकारा
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघाम्बर अंगे, स्वामी बाघाम्बर अंगे |
सनकादिक ब्रह्मादिक भूतादिक संगे || – ॐ जय शिव ॐकारा
कर में श्रेष्ठ कमण्डलु चक्र त्रिशूल धरता, स्वामी चक्र त्रिशूल धरता |
जगकर्ता जगहर्ता जग पालन कर्ता || – ॐ जय शिव ॐकारा
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका, स्वामि जानत अविवेका |
प्रणवाक्षर में शोभित यह तीनों एका || – ॐ जय शिव ॐकारा
निर्गुण शिवजी की आरती जो कोई नर गावे, स्वामि जो कोई नर गावे |
कहत शिवानंद स्वामी मन वाँछित फल पावे || – ॐ जय शिव ॐकारा
ऐसा माना जाता है कि पारद के शिवलिंग से पूजा करने से विशेष फल प्राप्त होता है । 

Monday, February 24, 2014

विजय एकादशी व्रत ,पूजा



फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष को पड़ने वाली एकादशी को विजय एकादशी कहते हैं ,और इस व्रत को करने से मनुष्य को विजय प्राप्त होती है ,इस विजया एकादशी के महात्म्य के श्रवण व पठन से समस्त पाप नाश को प्राप्त हो जाते हैं। 
विजय एकादशी का व्रत मनुष्य के सभी पुराने  और नए पापकर्मों से मुक्त करती है ,इसे विधिपूर्वक करने से मनुष्य इस धरा पर सम्पूर्ण सुख भोग कर मोक्ष को पप्राप्त होता है। 
इस वर्ष 2015 में यह एकादशी दिनांक 15 फरवरी दिन रविवार को पड़  रही है । 

कथा ------

इस व्रत की कथा कुछ इस प्रकार है -----------

  त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्रजी को जब चौदह वर्ष का वनवास हो गया, तब वे श्री लक्ष्मण तथा सीताजी ‍सहित पंचवटी में निवास करने लगे।  राक्षस राज  रावण ने जब सीताजी का हरण ‍किया, तब  श्री रामचंद्रजी तथा लक्ष्मण अत्यंत व्याकुल हुए और सीताजी की खोज में वैन-वन सीताजी को ढूंढने के लिए चल दिए। 

घूमते-घूमते जब वे मरणासन्न पक्षिराज जटायु जी के पास पहुँचे तो जटायु जी ने उन्हें सीताजी का वृत्तांत सुनाकर स्वर्गलोक चला गया। कुछ आगे जाकर उनकी सुग्रीव से मित्रता हुई और बाली का वध किया। और सीताजी का पता लगाकर वहाँ का सारा वृतांत राम जी को सुनाया ।  

श्री रामचंद्रजी ने वानर सेना सहित सुग्रीव की सेना लेकर लंका की और प्रस्थान किया। जब श्री रामचंद्रजी समुद्र से किनारे पहुँचे तब उन्होंने  उस अगाध समुद्र को देखकर लक्ष्मणजी से कहा कि इस समुद्र को हम किस प्रकार से पार करेंगे। 
श्री लक्ष्मण ने कहा हे पुराण पुरुषोत्तम, आप आदिपुरुष हैं, सब कुछ जानते हैं। यहाँ से आधा योजन दूर पर कुमारी द्वीप में वकदालभ्य नाम के मुनि रहते हैं। उन्होंने अनेक ब्रह्मा देखे हैं, आप उनके पास जाकर इसका उपाय पूछिए। लक्ष्मणजी के इस प्रकार के वचन सुनकर श्री रामचंद्रजी वकदालभ्य ऋषि के पास गए और उनको प्रमाण करके बैठ गए। 

मुनि ने भी उनको मनुष्य रूप धारण किए हुए पुराण पुरुषोत्तम समझकर उनसे पूछा कि हे राम! आपका आगमन किस काम के लिए हुआ है ? रामचंद्रजी कहने लगे कि हे ऋषिवर  मैं अपनी सेना ‍सहित यहाँ आया हूँ और राक्षसों को जीतने के लिए लंका जा रहा हूँ। आप कृपा करके समुद्र पार करने का कोई उपाय बतलाइए। मैं इसी कारण आपके पास आया हूँ। 

वकदालभ्य ऋषि बोले कि हे राम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का उत्तम व्रत करने से निश्चय ही आपकी विजय होगी, साथ ही आप समुद्र भी अवश्य पार कर लेंगे। 
 इस दिन स्नान आदि से निवृत होकर धूप -दीप आदि से भगवान् की पूजा अर्चना की जानी चाहिए ,तत्पचात कीर्तन अदि करना चाहिए । 

Saturday, February 22, 2014

भजन




                 यही नाम मुख में हो हरदम हमारे ,श्री कृष्ण गोविन्द मोहन मुरारे ---------

१. लिया दैत्य ने हाथ में जब कि खंजर, कहा पुत्र से है कहाँ तेरा ईश्वर ,
               तो प्रहलाद ने याद किया आह भरकर,दिखायी पड़े उसको खम्बे के अंदर ,
                     है नरसिंघ के रूप में राम प्यारे ---श्री कृष्ण --------------
२. सरोवर में गज-गृह की थी लड़ाई ,न गजराज की शक्ति कुछ काम आयी,
              कहीं से मदद उसने जब कुछ न पायी,दुखी हो के आवाज हरी को लगाई ,
                    गरुड़ छोड़ नंगे ही पैरों पधारे -श्री कृष्ण -----------
३. अजामिल अधम में न थी क्या बुराई,मगर आपने उसकी बिगड़ी बनायीं ,
             घडी मौत की सर पे जब उसके आयी ,तो बेटे नारायण की थी रट लगाई ,
                    तुरत खुल गए उसको बैकुंठ द्वारे --श्री कृष्ण ----------
४. दुःशासन ने जब हाथ अपने बढ़ाये ,तो द्रव्य बिंदु थे द्रोपदी ने गिराए ,
              न की देर कुछ द्वारिका से सिद्धये ,अमित रूप यूँ बनके साडी में आये ,
                    कि हर तार थे आपका रूप धारे -श्री कृष्ण -------------

Saturday, February 8, 2014

जया एकादशी पूजा ,कथा

जया एकाद्शी व्रत माघ मास की शुक्ल पक्ष की एकाद्शी को किया जाता है।  श्री कृष्ण जी बोले -हे धर्म पुत्र! माघ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम जाया है। 
इस वर्ष यह एकादशी १० फरवरी २०१४ को पड़  रही है ,और इस दिन धूप -दीप से भगवान् की पूजा की जानती है। 


 यह एकादशी सभी पापों को हरने वाली और उतम कही गई है. पवित्र होने के कारण यह उपवासक के सभी पापों का नाश करती है. तथा इसका प्रत्येक वर्ष व्रत करने से मनुष्यों को भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है. 

कथा --------

 एक समय की बात है, इन्द्र की सभा में एक गंधर्व गीत गा रहा था. परन्तु उसका मन अपनी प्रिया को याद कर रहा है. इस कारण से गाते समय उसकी लय बिगड गई. इस पर इन्द्र ने क्रोधित होकर उसे श्राप दे दिया, कि तू जिसकी याद में खोया है. वह राक्षसी हो जाए. 

देव इन्द्र का श्राप  सुनकर गंधर्व ने अपनी गलती के लिये इन्द्र से क्षमा मांगी  ,  और देव से विनिती की कि वे अपना श्राप वापस ले लें. परन्तु देव इन्द्र पर उसकी प्रार्थना का कोई असर न हुआ. उन्होने उस गंधर्व को अपनी सभा से बाहर निकलवा दिया. गंधर्व सभा से लौटकर घर आया तो उसने देखा की उसकी पत्नी वास्तव में राक्षसी हो गई.
अपनी पत्नी को श्राप मुक्त करने के लिए, गंधर्व ने कई यत्न किए. परन्तु उसे सफलता नहीं मिली. अचानक एक दिन उसकी भेंट ऋषि नारद जी से हुई. नारद जी ने उसे श्राप से मुक्ति पाने के लिये माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत  करने की सलाह दी। 
नारद जी के कहे अनुसार गंधर्व ने एकाद्शी का व्रत किया. व्रत के शुभ प्रभाव से उसकी पत्नी राक्षसी देह से छुट गई ॥ 

अतः जो मनुष्य यत्न के साथ विधिपूर्वक इस व्रत को करता है और रात्रि जागरण करता है उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते है और अंत में स्वर्गलोक को प्राप्त होता है । 

                       इस दिन शुद्ध गिरी का सागर लिया जाना चाहिए ॥ 

Monday, February 3, 2014

basant panchmi

बसंत पंचमी माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनायी जाती है ,यह  दिन सभी शुभ कार्यों के लिए शुभ माना गया है।
इस वर्ष ४ फरवरी २०१४ को बसंत पंचमी मनायी जा रही है ,इस दिन सरस्वती पूजा का विशेष महत्त्व है.


सृष्टि के रचना काल में विष्णु जी की आज्ञा से ब्र्ह्माजी ने मानव योनि की रचना की पर वः अपनी इस रचना से संतुष्ट नहीं थे। 



और तब ब्र्ह्मा जी ने भगवन विष्णु से आज्ञा लेकर पृथ्वी पर जल छिड़का ,जिससे धरती पर कम्पन होने लगा और एक अतिसुंदर स्त्री अद्भुत रूप में प्रकट हुई, जिनके एक हाथ में वीणा एवं दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। वहीं अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। जब इस देवी ने वीणा का मधुर नाद किया तो संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई, तब ब्रह्माजी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती नाम दिया। माँ सरस्वती को वीणावादिनी ,माँ भगवती,माँ शारदा के नाम से भी जाना जाता है। 

           वसंत पंचमी के दिन को माता सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। 
पुराणोँ  के अनुसार भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण अवतार के रूप में सरस्वती से खुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी आराधना की जाएगी। इस कारण हिंदू धर्म में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है।

सुमित्रानंदन पंत जी ने वसंत पंचमी पर ये कविता भी लिखी है ---

फिर वसंत की आत्मा आई, 
मिटे प्रतीक्षा के दुर्वह क्षण, 
अभिवादन करता भू का मन ! 
दीप्त दिशाओं के वातायन, 
प्रीति सांस-सा मलय समीरण,
चंचल नील, नवल भू यौवन,
फिर वसंत की आत्मा आई,

आम्र मौर में गूंथ स्वर्ण कण, 
किंशुक को कर ज्वाल वसन तन !
देख चुका मन कितने पतझर, 
ग्रीष्म शरद, हिम पावस सुंदर,
ऋतुओं की ऋतु यह कुसुमाकर,
फिर वसंत की आत्मा आई,

विरह मिलन के खुले प्रीति व्रण,
स्वप्नों से शोभा प्ररोह मन !

सब युग सब ऋतु थीं आयोजन,
तुम आओगी वे थीं साधन,
तुम्हें भूल कटते ही कब क्षण?
फिर वसंत की आत्मा आई,

देव, हुआ फिर नवल युगागम,
स्वर्ग धरा का सफल समागम !

आप सभी को वसंत पंचमी की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। ………