Monday, February 24, 2014

विजय एकादशी व्रत ,पूजा



फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष को पड़ने वाली एकादशी को विजय एकादशी कहते हैं ,और इस व्रत को करने से मनुष्य को विजय प्राप्त होती है ,इस विजया एकादशी के महात्म्य के श्रवण व पठन से समस्त पाप नाश को प्राप्त हो जाते हैं। 
विजय एकादशी का व्रत मनुष्य के सभी पुराने  और नए पापकर्मों से मुक्त करती है ,इसे विधिपूर्वक करने से मनुष्य इस धरा पर सम्पूर्ण सुख भोग कर मोक्ष को पप्राप्त होता है। 
इस वर्ष 2015 में यह एकादशी दिनांक 15 फरवरी दिन रविवार को पड़  रही है । 

कथा ------

इस व्रत की कथा कुछ इस प्रकार है -----------

  त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्रजी को जब चौदह वर्ष का वनवास हो गया, तब वे श्री लक्ष्मण तथा सीताजी ‍सहित पंचवटी में निवास करने लगे।  राक्षस राज  रावण ने जब सीताजी का हरण ‍किया, तब  श्री रामचंद्रजी तथा लक्ष्मण अत्यंत व्याकुल हुए और सीताजी की खोज में वैन-वन सीताजी को ढूंढने के लिए चल दिए। 

घूमते-घूमते जब वे मरणासन्न पक्षिराज जटायु जी के पास पहुँचे तो जटायु जी ने उन्हें सीताजी का वृत्तांत सुनाकर स्वर्गलोक चला गया। कुछ आगे जाकर उनकी सुग्रीव से मित्रता हुई और बाली का वध किया। और सीताजी का पता लगाकर वहाँ का सारा वृतांत राम जी को सुनाया ।  

श्री रामचंद्रजी ने वानर सेना सहित सुग्रीव की सेना लेकर लंका की और प्रस्थान किया। जब श्री रामचंद्रजी समुद्र से किनारे पहुँचे तब उन्होंने  उस अगाध समुद्र को देखकर लक्ष्मणजी से कहा कि इस समुद्र को हम किस प्रकार से पार करेंगे। 
श्री लक्ष्मण ने कहा हे पुराण पुरुषोत्तम, आप आदिपुरुष हैं, सब कुछ जानते हैं। यहाँ से आधा योजन दूर पर कुमारी द्वीप में वकदालभ्य नाम के मुनि रहते हैं। उन्होंने अनेक ब्रह्मा देखे हैं, आप उनके पास जाकर इसका उपाय पूछिए। लक्ष्मणजी के इस प्रकार के वचन सुनकर श्री रामचंद्रजी वकदालभ्य ऋषि के पास गए और उनको प्रमाण करके बैठ गए। 

मुनि ने भी उनको मनुष्य रूप धारण किए हुए पुराण पुरुषोत्तम समझकर उनसे पूछा कि हे राम! आपका आगमन किस काम के लिए हुआ है ? रामचंद्रजी कहने लगे कि हे ऋषिवर  मैं अपनी सेना ‍सहित यहाँ आया हूँ और राक्षसों को जीतने के लिए लंका जा रहा हूँ। आप कृपा करके समुद्र पार करने का कोई उपाय बतलाइए। मैं इसी कारण आपके पास आया हूँ। 

वकदालभ्य ऋषि बोले कि हे राम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का उत्तम व्रत करने से निश्चय ही आपकी विजय होगी, साथ ही आप समुद्र भी अवश्य पार कर लेंगे। 
 इस दिन स्नान आदि से निवृत होकर धूप -दीप आदि से भगवान् की पूजा अर्चना की जानी चाहिए ,तत्पचात कीर्तन अदि करना चाहिए । 

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