Thursday, August 28, 2014

ganesh chaturthi/गणेश चतुर्थी 17 september 2015




भाद्र पक्ष की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का आयोजन धूमधाम से किया जाता है, और  इसे विनायक चतुर्थी भी कहा जाता है  गणेशजी का वाहन मूषक है , इनको बुद्धि का देवत माना जाता है । इनकी पत्नी रिद्धि और सिद्धि हैं । और गणेश जी का प्रिय भग मोदक है जो चावल के आटे से बनाया जाता है और जिसमें नारियल और गुड़ डाला जाता है । चतुर्थी के दिन गणेश जी की स्थापना करने के बाद सभी लोग अपनी सुविधा के अनुसार रखते हैं ,और फिर १० दिनों के बाद विसर्जन किया जाता है । 
शिवपुराण में ऐसा विदित है कि एक समय माता पार्वती के स्नान से  मैल से एक पुत्र को उतपन्न किया और उनमें प्राण फूंक दिए, और उसे अपना द्वारपाल नियुक्त किया,  जिसने शिव जी के आने पर उन्हें भीतर न जाने दिया और शिव जी ने क्रोध में आकर उसका सर धड़ से अलग कर दिया, माता पार्वती अत्यं क्रुद्ध हो उठीं, महर्षि नारद के आग्रह पर माँ जगदम्बा की स्तुति द्वारा उनको शांत किया गया, श्री भगवन ने हठी का मस्तक उस पुत्र को लगाकर ओनह उनमें प्राण फूंक कर जीवित किया, भगवान शंकर ने बालक से कहा-गिरिजानन्दन! विघ्न नाश करने में तेरा नाम सर्वोपरि होगा। गणेश्वर!तू भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी को चंद्रमा के उदित होने पर उत्पन्न हुआ है। इस तिथि में व्रत करने वाले के सभी विघ्नों का नाश हो जाएगा और उसे सब सिद्धियां प्राप्त होंगी। कृष्णपक्ष की चतुर्थी की रात्रि में चंद्रोदय के समय गणेश तुम्हारी पूजा करने के पश्चात् व्रती चंद्रमा को अ‌र्घ्यदेकर ब्राह्मण को मिष्ठान खिलाए। किसी भी शुभ कार्य को आरम्भ करने से पहले विघ्नविनाशक श्री गणेश जी की पूजा की जाती है । 
महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी बड़े ही धूमधाम से मनाई जाती है । 
कैसे करें पूजन ,स्थापना और विसर्जन -------         

  • गणेशोत्सव के दिन प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर सोने, तांबे, मिट्टी अथवा गोबर  गणेशजी की प्रतिमा बनाई जाती है। गणेशजी की इस प्रतिमा को कोरे कलश में जल भरकर, मुंह पर कोरा कपड़ा बांधकर उस पर स्थापित किया जाता है। फिर मूर्ति पर (गणेशजी की) सिंदूर चढ़ाकरपूजन करना चाहिए ।
  • पूजन के समय अपना मुंह उत्तर या पूर्व की और रखना चाहिए । 
  • पूजन में पुष्प ,धूप के पश्चात :ॐ गण गणपतये नमः"मन्त्र से माला का जप करना चाहिए । 
  • पूजन में तिल ,गुड़ से बनी चीज़ों का भोग लगाना चाहिए ,गणेशजी को मोदक सर्वप्रिय है । 
  • अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करना चाहिए ।

  • कथा ------------

                     
    पौराणिक गणेश कथा के अनुसार एक बार देवता कई विपदाओं में घिरे थे। तब वह मदद मांगने भगवान शिव के पास आए। उस समय शिव के साथ कार्तिकेय तथा गणेशजी भी बैठे थे। 
    देवताओं की बात सुनकर शिवजी ने कार्तिकेय व गणेशजी से पूछा कि तुममें से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय व गणेशजी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की मदद करने जाएगा।
        

    भगवान शिव से यह सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए। परंतु गणेशजी सोच में पड़ गए कि वह चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा कैसे करेंगे ,इस तरह से तो बहुत समय लग जाएगा। 
    उन्हें एक उपाय सूझा। गणेश अपने स्थान से उठें और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करके वापस बैठ गए। परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजेता बताने लगे। तब शिवजी ने श्रीगणेश से पृथ्वी की परिक्रमा ना करने का कारण पूछा।

    तब गणेश ने कहा - 'माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं।' 
    यह सुनते ही भगवान शिव ने गणेशजी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी। इस प्रकार भगवान शिव ने गणेशजी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा उसके तीनों ताप यानी दैहिक ताप, दैविक ताप तथा भौतिक ताप दूर होंगे। 
  •  जिस भी दिन विसर्जन किया जाना हो पूजन ,वंदन करके कलश और थाल के साथ गणेश जी की प्रतिमा को बंधू जनों के साथ जाकर किसी नदी या तालाब में जाकर विसर्जित करना चाहिए । 
भाद्र पक्ष की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन चन्द्र दर्शन भी निषिद्ध है ,ऐसी मान्यता है की इस दिन चन्द्र दर्शन से झूठा कलंक लगता है। और कहा ये जाता है की यदि गलती से चन्द्र दर्शन हो जाएं तो भागवत में स्यांतक मणि की कथा को विस्तार पूर्वक पढ़ने से इसका दोष नहीं रहता ॥ 




Tuesday, August 19, 2014

aja ekadashi/अजा एकादशी /21 अगस्त 2014/वीरवार


भाद्र पक्ष की कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी मनाई जाती है । इस व्रत में आत्मशुद्धि तथा अध्यात्मिकता का मार्ग खुलता है ।


कथा----

  •   सूर्य वंश में राजा हरिश्चन्द्र का जन्म अयोध्या नगरी में हुआ था। राजा हरिश्चन्द्र के द्वार पट पर एक श्याम पट लगा था और जिसमें मडीयों से लिखा था ,"इस द्वार पर मुंह माँगा दान दिया जाता है ,कोई भी खाली हाथ नहीं जाता है "

    महर्षि विश्वामित्र ने पढ़ कर कहा यह लेख मिथ्या है।  राजा बोले 'आप परीक्षा कर लें महाराज "

    विश्वामित्र बोले --अपना राज्य मुझे दे दो। राजन ने कहा राज्य आपका है ,और क्या चाहिए ? 

    विश्वामित्र बोले- : दक्षिणा भी तो लेनी है "रहू ,केतु और शनि की पीड़ा भोगनी सहज है ,साढ़ेसाती का कष्ट भी सुगम है ,मेरी परीक्षा में पास होने बड़ा ही कठिन है। आपको मुर्दे जलने होंगे ,आपकी पत्नी को दासी बनना पड़ेगा। यदि आप इन कष्टों से भय नहीं तो हमारे साथ काशी चलें। 

    राजा पत्नी और पुत्र के साथ काशी गए वहां स्वयं श्मशान में डोम (शवों को जलने के लिए लकड़ी बेचने वाले ) बने ,पत्नी दासी बनी। 

    राजा के पुत्र को नाग ने डस लिया परन्तु ऐसी विपत्ति में भी राजन ने सत्य का मार्ग नहीं त्यागा। 

    परन्तु मन में शोक उत्पन्न हुआ।  उस समय गौतम ऋषि ने राजा को अजा  एकादशी का व्रत विधि पूर्वक करने को कहा।  राजा ने विधिपूर्वक अजा  एकादशी का व्रत पूजन किया और इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से अपने पुत्र को जीवित पाया तथा पत्नी को आभूषणों से युक्त पाया।  एकादशी व्रत के प्रभाव से अनंत में स्वर्ग को प्राप्त हुए। 

    इस कथा के महात्म्य का फल अश्वमेघ यग्य के फल के सामान माना गया है। 

  • इस दिन बादाम था छुहारे का सागार लिया जाना चाहिए।