Sunday, December 20, 2015

मोक्षदा एकादशी 21 December 2015 monday

मार्गषीस के शुक्ल पक्ष को पड़ने वाली एकादशी का नाम मोक्षदा एकादशी है, मोक्षदा एकदशी के दिन ही गीता जयंती मनाई जाती हैं इस दिन भगवान कृष्ण के मुख से पवित्र भगवत गीता का जन्म हुआ था, मोक्षदा एकादशी का सार भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं अर्जुन से कहा था |
  इस दिन श्री कृ्ष्ण व गीता का पूजन करना चाहिए. इसके बाद आरती करके उसका पाठ करना चाहिए. मोक्षदा एकाद्शी को दक्षिण भारत में वैकुण्ठ एकादशी के नाम से भी जाना जता है।
 गीता में भगवान श्री कृ्ष्ण ने कर्मयोग पर विशेष बल दिया है. ब्राह्राण भोजन कराकर दान आदि कार्य करने से विशेष फल प्राप्त होते है. वर्ष २०१५ में यह एकादशी २१ दिसम्बर दिन सोमवार को पड़ रही है।  मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी अनेकों पापों को नष्ट करने वाली है. यह एकादशी मोक्षदा के नाम से प्रसिद्ध है. इस दिन भगवान श्री दामोदर की पूजा, धूप, दीप नैवेद्ध आदि से भक्ति पूर्वक करनी चाहिए ।

इस एकादशी की कथा इस प्रकार है ----

 
चंपा नगरी नाम के एक राज्य में एक प्रतापी राजा जिनका नाम वैखानस था,  रहा करते थे.जो की बहुत प्रतापी एवं धार्मिक राजा थे । इसी कारण प्रजा में भी खुशहाली थी | कई प्रकांड पंडित व् ब्राह्मण उसके राज्य में निवास करते थे। 
एक दिन राजा को स्वपन दिखा जिसमे उनके पिता नरक की यातनायें झेल रहे हैं, ऐसा स्वपन देखने के बाद राजा बैचेन हो उठे और सुबह होते ही उसने अपनी पत्नी से अपने स्वप्न का विस्तार से बखान किया ।  राजा ने यह भी कहा इस दुःख के कारण मेरा चित्त कहीं नहीं लग रहा मैं इस धरती पर सम्पूर्ण ऐशो आराम में हूँ और मेरे पिता कष्ट में हैं ।  यह जानने के बाद मेरा चित्त बहुत व्याकुल हो रहा है, कृपा कर मुझे इसका हल बतायें । पत्नी ने कहा कि महाराज आपको आश्रम में जाना चाहिये |
राजा आश्रम गए।  वहाँ कई सिद्ध गुरु थे सभी अपनी तपस्या में लीन थे । 
 महाराज पर्वत मुनि के पास गए उन्हें प्रणाम किया और समीप बैठ गए,  पर्वत मुनि ने मुस्कुराकर आने का कारण पूछा , "राजा अत्यंत दुखी थे उनकी आँखों से अश्रु की धार लग गई, तब पर्वत मुनि ने अपनी दिव्य दृष्टी से सम्पूर्ण सत्य देखा और राजा के सर पर हाथ रखा और यह भी कहा तुम एक पुण्य आत्मा हो जो अपने पिता के दुःख से इतने दुखी हो ।  तुम्हारे पिता को उनके कर्मो का फल मिल रहा हैं । उन्होंने तुम्हारी माता को तुम्हारी सौतेली माता के कारण बहुत यातनाये दी , इसी कारण वे इस पाप के भागी बने और नरक भोग रहे हैं |राजा ने पर्वत मुनि से इस दुविधा के हल पूछा इस पर मुनि ने उन्हें मोक्षदा एकादशी व्रत पालन करने एवम इसका फल अपने पिता को देने का कहा । राजा ने विधि पूर्वक अपने कुटुंब के साथ व्रत का पालन किया और अपने पिता को इस व्रत का फल अपने पिता के नाम से छोड़ दिया जिस कारण उनके पिता के कष्ट दूर हुये और उन्होंने अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया॥

 इस भगवान विष्णु के साथ दामोदर एवम कृष्ण की भी पूजा की जाती हैं। 
 इस दिन तुलसी पत्र व् मंजरी से पूजन किया जाना अति उत्तम माना गया है साथ ही बेल पत्र का सागार लेना चाहिए ।

Sunday, September 27, 2015

Tata Sky Transfer manoranjan ki duniya ka naya tohfa

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Monday, September 21, 2015

पद्मा /पदमा /परिवर्तिनी/वामन एकादशी एकादशी व्रत कथा

भाद्रपक्ष की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मा एकादशी के नाम से जाना जाता है, इस एकादशी की पूजा करने से बाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। इस एकादशी को वामन एकादशी भी कहा जाता है। 

 

कथा -------

त्रेता युग में प्रहलाद के पौत्र राजा बलि राज्य करता था ,ब्राह्मणों का सेवक था और भगवान् विष्णु का परम भक्त था । मगर इन्द्रादि देवताओं का शत्रु था । अपने भुज बल से देवताओं को विजय करके स्वर्ग से निकाल दिया था । देवताओं को दुखी देखकर भगवन विष्णु में वामन का स्वरुप धारण किया और राजा  बलि के द्वार पर आकर खड़े हो गए और कहा मुझे तीन पग प्रथ्वी का दान चाहिए , बलि बोले --"तीन पग क्या मैं तीन लोक दान कर सकता हूँ " 

भगवान् ने विराट रूप धारण किया ,२ लोकों को २ पग में ले लिए ,तीसरा पग राजा बलि के सर पर रखा जिसके कारण पातळ लोक चले गए । 

जब भगवान् वामन पैर उठाने लगे तब बलि ने उनके चरणों को पकड़कर कहा इन्हें मैं मंदिर में रखूंगा । 

तब भगवान् बोले -"यदि तुम वामन एकादशी का व्रत करोगे तो में तुम्हारे द्वार पर कुटिया बनाकर रहूँगा। "

राजा बलि एकादशी का व्रत विधिपूर्वक किया और कहा जता है की तभी से भगवान् की एक प्रतिमा पातळ लोक में द्वारपाल बनकर निवास करने लगी और एक प्रतिमा छीर सागर में निवास करने लगी ।

 इस दिन भगवन विष्णु की पूजा का विधान है साथ ही इस दिन ककड़ी का सागर लिया जाना चाहिए । 

हम गृहस्थ आश्रम में रहकर जितनी विधि - विधान से पूजन कर सकते हैं करना चाहिए, ईश्वर ने ऐसा कोई नियम नहीं बनाया है की आप पूरी विधि का ही पालन करें हाँ, सभी पूजन में साफ- सफाई का ध्यान अवश्य किया जाना चाहिए ।

Monday, August 24, 2015

पुत्रदा एकादशी


श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी के रूप में पूजा जाता है । भगवन विष्णु की पूजा अर्चना करके उपवास रखा जाता है । व्रत ,पूजा के साथ ही भजन कीर्तन करते हुए श्री विष्णु भगवान् के समक्ष ही शयन भी किया जाना चाहिए । कहा ये जाता है की इस एकदशी के व्रत से पुत्र प्रप्ति होती है ।

कथा ----

            प्राचीन समय में महिष्मति नगरी में महीजित  नाम का राजा राज्य करते थे । अत्यंत शांतिप्रिय धर्मात्मा तथा ज्ञानी थे परन्तु उनके कोई भी संतान नहीं थी ,जिसके कारण राजा अत्यंत दुःख में डूबे रहते थे । 

                                       प्रस्तुत चित्र मैंने गूगल  से लिया है 
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दिनांक २६ अगस्त २०१५, श्रावण मास शुक्ल पक्ष की एकादशी पुत्रदा एकादशी के नाम से की जाती है. संतान सुख की आशा रखने वालों के लिए यह एकादशी अत्यधिक फलदायी बताई गयी है । 
इस एकादशी की कथा इस प्रकार है ----
एक बार राजा ने राज्य के समस्त मुनियों को बुलाया और संतान प्राप्ति का उपाय पूछा ,! इस पर परम ज्ञानी ऋषि लोमेश ने बताया की अपने पूर्व जन्म में श्रावण मास की एकादशी को प्यासी गाय को सरोवर में पानी पीने से से रोका था और उसी गाय के  श्राप से आप अभी तक निः संतान हैं। 
             अतः आप श्रावण मास की एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करें तथा रात्रि जागरण कीजिये तो संतान की प्राप्ति अवश्य होगी।  तब राजा ने ऋषि की आज्ञानुसार  एकादशी का विधिपूर्वक व्रत किया,मुनियों और संत जनों को भोजन कराकर दक्षिणा दी , और  उन्हें  संतान की प्राप्ति हुई। 
              इस दिन गुड़ का सागार लिया जाना चाहिए /

Monday, August 3, 2015

सावन और शिव पूजन का महत्त्व


सावन माह का हिन्दू धर्म में विशेष महत्त्व है । चारों ओर हरियाली से भरपूर प्रकृति में एक असीम ही आनंद की प्राप्ति होती है।
साथ ही इस माह में शिव जी की पूजा का भी विशेष विधान है । सावन माह के सोमवार के व्रत का भी विधान है, लोग इस माह में मांस -मदिरा का त्याग कर देते है ,कुछ लोग बाल भी नहीं बनवाते हैं ,और पूरे सावन में शंकर जी के मंदिर में जलाभिषेक करते हैं । इस माह में शिव -पुराण पढ़ने  का विशेष महत्त्व है।
वर्ष २०१५ में सावन १ अगस्त से शुरू हो रहे हैं। 
सावन में ही नहीं अपितु हर माह में शिव पूजा का फल मिलता है ,  मगर सावन माह शंकर जी अति प्रिय है , कहा जाता है सावन में रुद्राभिषेक करने से उत्तम फल की प्राप्ति होती है । माता पार्वती ने शिव जी को पति के रूप में पाने के लिए कठिन तप किया था ।लोग कांवर ले कर जाते हैं और शिव धाम में जाकर जलाभिषेक करते हैं ।

  • पूरे  सावन में विल्व -पत्र चढाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है .। 
  • विल्व -पत्र पर राम नाम लिख कर शिव जी पर चढ़ाएं । 
  • सावन में शहद या गन्ने के रस से अभिषेक का विशेष महत्त्व है .। 

शिव पुराण में भगवान् शिव पर विभिन्न पुष्पों की पूजा का क्या फल मिलता है इसका विस्तृत वर्णन है --

  • लाल डंडे वाले धतूरे के पुष्प चढ़ाने से उत्तम संतान की प्राप्ति  होती है । .
  • आयु की कामना रखने वाला यदि सावन माह में सवा लाख दूर्वा चढ़ाये तो दीर्घ आयु की प्राप्ति होती है । 
  •  तुलसी दल चढ़ाने वाले को मोक्ष की प्राप्ति होती है । 
  • सफ़ेद और लाल आक के पुष्प भोग और मोक्ष दोनों ही प्रदान करते हैं । 
  • बंधूक (दुपहरिया ) के पुष्प चढ़ाने से आभूषणों की प्राप्ति होती है । 
  • चमेली के पुष्प चढ़ाने से वाहन   आदि की प्राप्ति होती है ऐसा शिव पुराण में वर्णन है । 
  • शमी -पत्र चढ़ाने से भी मोक्ष की प्राप्ति होती  है । 
  • बेल ,जूही और कनेर के पुष्प वस्त्र ,और धन-धन्य दिलाने वाले होते हैं । 
  • राई  के पुष्प शत्रुओं पर विजय दिलाते हैं । 
  • चंपा और केवड़ा के अतिरिक्त सभी पुष्प शिव जी को प्रिय हैं । 
  • यदि आसानी से केवड़ा के पुष्प न मिलें तो केवड़ा जल से भी शिव जी का अभिषेक किया जा सकता है। 
  •  बिल्व पात्र पर राम नाम लिख कर अर्पित करने से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।

इन सभी पुष्पों को कम से कम सवा लाख की मात्रा में यदि चढ़ाया जाये तो अभीष्ट की प्राप्ति होती है .

  • भगवान शिव को चावल के अक्षत चढाने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है । 
  • किसी  भी पूजा  का फल तब प्राप्त होता है जब पूजा सच्चे मन और लगन से की जाये । 
सावन में गन्ने के रस से अभिषेक करने से गृह कलह से मुक्ति मिलती है । सवा लाख तिलों से शिवजी को आहुति दी जाये तो शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है ।

बोलो हर हर महादेव

Friday, June 12, 2015

योगिनी एकादशी


एकादशी व्रत वर्ष भर में २४ पड़ती हैं और एक माह में २ ,पंद्रह दिन के अंतराल पर एकादशी का व्रत पड़ता है ,एकादशी के व्रत का बहुत महत्व है और इस व्रत में विष्णु भगवान की पूजा अर्चना की जाती है।
योगिनी एकादशी आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी है -
यूँ तो किसी भी व्रत या पूजन में स्नान करने के उपरांत ही पूजन करने का विधान है ,इस एकादशी में स्नान से निवृत होकर साफ़ आसान पर बैठ कर विष्णु प्रतिमा को स्नान कराकर वस्त्र, तिलक चन्दन लगाकर विराजित कर पूजन किया जाना चाहिए।
 वर्ष २०१५ में यह व्रत दिनांक १३ जून को पड़ रहा है -

इस व्रत की कथा इस प्रकार है ---

 अलकापुरी में शंकर भक्त कुबेर जी रहते थे, पूजा के लिए हेममाली पुष्प लाया करते थे, उसकी स्त्री अति सुन्दर थी जिसका नाम विशालाक्षी था।  हेममाली एक दिन मानसरोवर से पुष्प तोड़कर घर लाया पत्नी की छवि देख कामातुर हो गया, पूजा के लिए लए पुष्प भूल वो पत्नी के संग क्रीड़ा में लींन हो गया।  कुबेर भंडारी राह देखते रह गए, गुप्तचरों द्वारा उसके कुकर्मों का पता चला। 
कुबेर ने माली को बुलाकर कहा ,"अरे पापी तूने पूजयवर जी का तिरस्कार किया है इस कारण से मैं तुझे श्राप देता हूँ ,नीच तू स्त्री के वियोग से दुःख भोगेगा,मृत्युलोक में जाकर कोढ़ी हो जायेगा "
कुबेर के श्राप से माली पृथ्वी पर गिराया गया, कोढ़ी बनकर कष्ट पाने लगा, शरीर से दुर्गन्ध आती थी परन्तु अन्तः करण उसका दर्पण के सामान शुद्ध था। 
शंकर जी की भक्ति के प्रभाव से उसे पिछले जन्म की स्मृति थी।  प्रायश्चित करने के लिए वह हरिद्वार आया, गंगा जी का स्नान किया परन्तु मधुमक्खियों ने उसका पीछा न छोड़ा।  अंत में पतित पावनि देव भूमि उतराखंड को चला देव प्रयाग होते हुए यमुनोत्री के तट पर पहुंचा जहाँ चिरजीवा महामुनि मार्कण्डेय जी का आश्रम था। 
उनके दर्शन से मक्खियाँ अपने आप अंतर्ध्यान हो गयीं, हेममाली उनके चरणों में गिरकर अपने अपराध की कथा सुनाकर उपाय पुछा , मार्कण्डेय मुनि जी ने आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी योगिनी के व्रत की विधि बताते हुए उसे इस एकादशी की विधिवत पूजन करने की आज्ञा दी और कहा इससे सब पापों से मुक्ति मिल जाएगी। 
हेममाली ने योगिनी एकादशी का व्रत किया और इसके प्रभाव से अपने दिव्य स्वरूप को प्राप्त हुआ। 
कहा जाता है की जो फल अठासी हज़ार ऋषियों को भोजन खिलने से मिलता है वो केवल योगिनी एकादशी के व्रत से ही मिल जाता है। 

फलाहार ---इस दिन मिश्री का सेवन किया जाना चाहिए

Thursday, May 7, 2015

बड़ा मंगल /लखनऊ शहर में जेठ में पड़ने वाले पहले मंगल को बड़ा मंगल कहा जाता है .

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मनाया जाने वाले बड़े मंगल  का विशेष महत्त्व है, यूँ तो वर्ष के सभी मंगल और शनिवार को श्री हनुमान जी की पूजा का विशेष फल मिलता है ,परन्तु जेठ के सभी मंगल पर हनुमान जी की विशेष कृपा होती है ऐसी मान्यता है ।
कहा जाता है की श्री राम की भक्ति और कृपा पाने का शीधा और सरल उपाय है हनुमान जी की आराधना  .
लखनऊ शहर में जेठ में पड़ने वाले पहले मंगल को बड़ा मंगल कहा जाता है,परन्तु जेठ माह में पड़ने वाले सभी मंगल को यहाँ विशेष पूजा,मेले लगाये जाते हैं।
नवाबों के इस शहर में मनाये जाने वाले इस त्यौहार की हिन्दू धर्म में ही नहीं अपितु विभिन्न धर्मों के लोगों में भी इसकी आस्था है ।

ऐसा कहा जाता है मुगलशासक नवाब मोहम्मद अली शाह का बेटा नवाब  सआदत अली काफी बीमार पड़ गया ,तब उनकी माँ छतर कुंवर जनाबे अलिया ने मन्नत मांगी और बाबा हनुमान की कृपा से नवा सआदत अली ठीक हो गए ,उनके स्वस्थ होने पर उनकी माँ ने अलीगंज के मंदिर की स्थापना करायी और उस समय से जेठ माह के मंगल को बड़े मंगल के रूप में मनाया जाने लगा । 
अलीगंज में ही मंदिर को बनवाए जाने की एक और रोचक कथा इस प्रकार है -
कहा जाता है कि मंदिर की स्थापना के लिए जब मूर्ती हाथी पर रख कर लायी जा रही थी तब हाथी अलीगंज के इसी स्थान पर बैठ गया काफी कोशिशों के पश्चात भी वह वहां से नहीं हिला तब इसी स्थान पर मंदिर की स्थापना की गयी । 
लगभग ४ सौ पुरानी यह परम्परा अब बहुत बड़ा रूप ले चुकी है । ऐसा कहा जाता है की जेठ के पहले मंगल को अलीगंज, दुसरे को हनुमान सेतु ,तीसरे को अमीनाबाद और चौथे मंगल को नका हिंडोला पर स्थापित हनुमान मंदिर में मेले का आयोजन किया जाता है,परन्तु अब तो पूरे शर के हर हनुमान मंदिर में ही जेठ के मंगल को पूजा अर्चना की जाती है । 
इस दिन जगह-जगह भंडारे ,पियाउ लगवाये जाते है ,लोग बड़ी श्रद्धा से भंडारे करते हैं पूरे दिन प्रसाद का वितरण होता है ,शरबत और पानी का वितरण किया जाता है । 
इस मंगल की महत्ता इतनी है कि लोग सूर्य उदय के पहले ही मंदिरों में पहुँच कर दर्शन करने जाते है ,जो लोग कोई भी मन्नत मांगते हैं पूरी होने पर जमीन पर लेट कर  जाते हैं। 
इस दिन जगह-जगह रामायण का आयोजन होता है ,कुछ लोग सुन्दरकाण्ड का पाठ भी करते हैं । 
जेठ की तप्ती दोपहर की फ़िक्र किये बिना ही लोग घंटों लाइन मैं लग कर दर्शन करने जाते हैं।

Monday, April 13, 2015

वरूथनी एकादशी व्रत महत्व ,पूजा,विधि

                                       दिनांक १५ अप्रैल २० १५

    वरूथनी एकादशी का व्रत बैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को किया जाता है ,पाण्डु पुत्र युधिष्ठिर ने जब श्रीकृष्ण से पुछा-" कि बैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को क्या कहते हैं" ,तब श्रीकृष्ण जी ने बताया कि इस एकादशी को बरूथनी एकादशी के नाम से जाना जाता है  । 

महत्व -------

कहा जाता है -जो मनुष्य इस एकादशी को पूर्ण श्रद्धा से इस व्रत को करते हैं उन्हें दस हजार वर्ष तप करने से जो फल मिलता है वो ही इस व्रत के प्रभाव से मिलता है ,कन्या दान से भी उत्तम इस व्रत का फल है ,जो फल कुरुक्षेत्र में स्नान से मिलता है वो ही इस व्रत के प्रभाव से मिलता है। 

व्रत की विधि-------


इस एकादशी के व्रत के के दिन पूर्व यानि की दशमी को रात्रि में सात्विक भोजन करना चाहिए साथ ही शयन के लिए धरती का उपयोग करना चाहिए ,व्रती को प्रातः स्नान से निवृत होकर पूजन सामिग्री एकत्रित करने के उपरांत धूप ,डीप और धान्य से पूजन करना चाहिए । 

कथा ----


प्राचीन समय में नर्मदा नदी के तट पर  राजा मान्धाता राज्य सुख को भोग रहे थे ,राजयकाज करते हुए भी राजन अत्यधिक दानशील और तपस्वी थे , एक दिन जब राजन तपस्या में लीं थे उसी समय एक जंगली भालू ने राजा का पैर काटना शुरू कर दिया और थोड़ी ही देर में वह राजा को जंगल में ले गया ,राजा घर गए और उन्होंने भगवान विष्णु की आराधना की और शीघ्र ही श्री विष्णु वहां प्रकट हो गए, और उन्होंने अपने चक्र से उस भालू को मार गिराया ,पर तब तक भालू उनका पैर तो खा ही चूका था जिसके कारण राजा बहुत चिंतित हुए।
भगवान वुशनु जी ने कहा तुम मथुरा में जाकर मेरी वराह अवतार की पूजा करो और वरूथनी एकादशी का व्रत करो। राजन ने पूर्ण शर्द्धा से इस व्रत को किया और वो पहले जैसे सुन्दर अंगों वाले हो गए । 

Wednesday, April 8, 2015

भजन

;           वह शक्ति हमें दो दयानिधे कर्तव्य मार्ग पर डट जावें 

                           पर सेवा पर उपकार में हम निज जीवन सफल बना जावें

१. हम दीं,दुखी,निबलों,विकलों के सेवक बन संताप हरें ,

                           जो हो भूले,भटके, बिछड़े ,उनको तारें खुद तर जाएं ,वह शक्ति हमें दो -----

२. छल,द्वेष,दम्भ, पाखंड, झूठ, अन्याय से निसदिन दूर रहें,

                         जीवन हो शुद्ध सरल अपना,शुचि प्रेम सुधा रस बरसायें ,वह शक्ति हमें -----

३ं. निज  आन,मान, मर्यादा का, प्रभु ध्यान रहे अभिमान रहे ,

                       जिस देश जाति  में जन्म लिया, बलिदान उसी पर हो जावें ,वह शक्ति हमें दो ----- 

 

 

Friday, March 13, 2015

navratri shubhaarmbh /नवरात्री का शुभारम्भ 21 march 2015

दोस्तों ,इस वर्ष नवरात्री का शुभारम्भ दिनांक 21 मार्च २०१5 को हो रहा है ,और हर वर्ष की भांति हम सभी अपने मंदिर में पूजन करने के लिए जाने की तैयारी में लग गए हैं.
फिर मैंने सोचा जाने से पूूर्व आप सभी के साथ नवरात्री की पूजा की विस्तृत जानकारी शेयर कर लूँ ,

नवबर्ष का आरंभ ------

भारतीय शास्त्र के अनुसार चैत्र मास    के शुक्ल पक्ष से नव वर्ष का आरम्भ होता है .ऐसा माना जाता है की इसी दिन ब्रह्मा जी ने स्रष्टि का सृजन किया था .कुछ लोग ऐसा मानते हैं की भारत के प्रतापी राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के संवत्सर का आरंभ भी इसी दिन से किया  था ,अतः इस दिन का दोनों ही द्रष्टि से बहुत महत्त्व है .ऐसी मान्यता भी है की इसी दिन भगवन विष्णु ने मतस्य अवतार लिया था ,

सवाल ये है की  इसी दिन से ही संवत्सर का आरंभ क्यों माना जाता है ---

१.तो पहली बात यह मानी जाती है की चैत्र मास  में ही वृक्ष और लताएं  नव पल्लवित होती हैं .
२. कहते हैं की माघ मास  में मधुरस पर्याप्त मात्रा में मिलता है ,मगर इसका कहीं भी स्पष्ट उल्लेख नहीं है ,इसलिए चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से ही नव वर्ष का आरम्भ माना गया है .

इसी दिन पंचांग की पूजा का भी विधान है 

,बहुत सारे घरों में पंडित के द्वारा पंचांग की पूजा कराकर संवत सुनकर  नव वर्ष का स्वागत किया जाता है ,मुझे याद है हमारे घर में भी हमारे पूज्य दादाजी भी इस पूजा का आयोजन करते थे उसके बाद पूज्य  पिताजी और फिर हमारे भाइयों ने भी इस प्रथा को आगे बढाया .
चैत्र मास की प्रतिपदा को गुडी पड़वा के रूप में भी हर्सौलास से मनाया जाता है ,सूर्य को अर्घ्य देकर नव वर्ष का स्वागत किया जाता है .
 नवरात्री साल में मुख्यतः २ बार  मनाई जाती हैं जिसमें एक चैत्र पक्ष की और दूसरी आश्विन पक्ष की .इन दोनों में ही सामान रूप से माँ दुर्गा और कन्या की पूजा का विधान है .नवरात्री पूजन प्रतिपदा से दशमी तक मनाई जाती  है ,ज्यादातर लोग नवमी को कन्या पूजन करके उपवास समाप्त करते हैं .
पूजन के स्थान की अच्छी तरह से सफाई करें और अगर सम्भव हो तो पूजा घर को पानी से घो लें .
सभी भगवान् के वस्त्र बदल दें .माता की मूर्ति या फोटो को साफ़ कर लें . अब सबसे पहले घट स्थापना की तैयारी करें .

पूजा के लिए जो भी स्थान नियत हो वो स्थान ,पहनने वाले वस्त्र हमेशा शुद्ध हों ,आसन काला नहीं होना चाहिए ,ऐसी मान्यता है की पूजन के लिए ऊन  का आसन सर्वोत्तम होता है ,कहते हैं की काठ के ऊपर बैठकर पूजा करने से निर्धनता आती है ,और पत्थर पर बैठ कर पूजा करने से रोग आते हैं ,अतः कोशिश  करनी चाहिए की पूजा का स्थान और आसन दोनों ही पवित्र हों .

घट स्थापना -----

  1.   १ कलश मिटटी का या फिर पीतल का 
  2.   जों बोने के लिए एक मिट्टी का पात्र .
  3.   जटा  वाला  नारियल  .
  4. पान के या अशोक के पत्ते ५ .
  5. साफ़ मिट्टी या रेता .
  6. चावल १ बड़ा चम्मच .
  7. एक गहरी कटोरी .
  8. रोली ,और मोली .
  9. रूपये .इछानुसार .
  10. जोँ  २ बड़े चम्मच 
  11. नारियल के लिए कपडा . 

विधि -------

  1. कलश को अच्छी तरह से धो कर उसमें साफ़  पानी भरें .
  2. अब मिट्टी के पात्र को भी पानी से धो लें . 
  3. इसमें मिट्टी भरें .
  4. अब इस मिट्टी  में जों को चारों  ऒर फैलाते हुए बो दें .
  5. इसके बीच में कलश को रखें और कलश के गर्दन में मोली को चारों ओर से लपेटें .
  6. कटोरी में चावल भरकर इसे  कलश के ऊपर रखें और कटोरी के नीचे पहले कलश में आम के पत्तों  को सजाते हुए लगायें ताकि इस कटोरी से ठीक से सेट हो जाएँ .
  7. अब रोली की सहायता से कलश पर स्वस्तिक बनाएं .
  8. नारियल पर कपडा और  मोली  बाँध कर इसे चावलों वाली कटोरी के ऊपर रखें ,
  9. नारियल पर रूपये चढ़ाएं .

पूजन का सामान -----

  1. माता की चुन्नी .
  2. रोली , मोली  ,
  3. साबुत सुपारी .९ 
  4. जायफल ९  
  5. पान के पत्ते  ९ .
  6. हवन  सामिग्री १ किलो .
  7. काले तिल १ ० ० ग्राम .
  8. चावल धुले हुए ५ ० ग्राम .
  9. पञ्च मेवा कटी हुई २ बड़े चम्मच .
  10. गुड़  २ बड़े चम्मच .
  11. बूरा   १ बड़ा चम्मच .
  12. देशी घी २ बड़े चम्मच .
  13. रुई .
  14. चावल पूजा के अक्षत के लिए  
  15. धूप  बत्ती .
  16. चौकी १ .
  17. बड़ा दिया १ .
  18.  लाल कपडा बिछाने के लिए १ मीटर .
  19. गूगल १ चम्मच .
  20. ताम्र कुंड  हवन के लिए 
  21. कपूर .
  22. लौंग .
  23. दिए के लिए तेल या घी .
  24. पुष्प .
  25. बताशे प्रशाद के लिए 
  26. जल का लोटा 
  27. हवन के लिए आम की लकड़ी .

विधि -------------

  1.  चोकी के ऊपर लाल वस्त्र बिछाकर माता को चुन्नी उढ़ाकर  विराजित करें .
  2. हवन सामिग्री में गूगल ,मेवा,चावल,तिल ,जों, देशी घी ,बूरा,गुड़ को अच्छी तरह से मिलाकर सामिग्री को तैयार करें .
  3. अब माता के उत्तर पूर्व में घट रखें ,और दिए में घी या तेल सामर्थ्य के अनुसार भर कर और माता के समक्ष रखें .
  4. थाली में रोली,मोली ,चावल ,धूप बत्ती ,लौंग ,कपूर ,पुष्प ,बताशे रखें।

पूजन की विधि -----------

  1. आसन को बिछा कर बैठें और माँ का ध्यान करें .
  2. जल से आचमन करें,अब माता को स्नान कराएं  ,पुष्प समर्पित करें ,
  3. टीका करें ,दिया प्रज्व्व्लित करें और फिर माता की आराधना करें 
  4. आराधना में माता की स्तुति ,चालीसा पाठ  और आरती करें .
  5. अब हवन के लिए कुंड में लकड़ी लगाकर कपूर से प्रज्वलित करें और सभी लोगों को सामान भाग से सामिग्री दे कर हवन शुरू करें .
  6. हवन करने के बाद प्रशाद ,पान चढ़ाएं .
  7. हवन के लिए या तो पंडित बुलाकर हवन कराएं या फिर स्वयं करें ,स्वयं हवन करने के लिए मन्त्र किसी पंडित से पूँछ कर ही करें ,अन्यथा न करें .
  8. अंत में सबको प्रशाद बांटें .

उपवास ---

  1.    नवरात्री मे अधिकतर लोग उपवास रखते हैं ,अगर आप ९ दिनों का व्रत नहीं रख सकते हैं तो पहला और आखिरी  यानि की प्रतिपदा और अष्टमी का व्रत रखें .
  2. उपवास में फल ज्यादा खाएं और पानी भी लगातार पियें  ताकि शरीर में पानी की कमी न हो .
  3. व्रत ,उपवास शरीर के क्षमता के अनुसार ही रखना चाहिए . 
  4. नवरात्रि में माता का कीर्तन अवश्य करें ,ऐसी मान्यता है की यदि माता के छंद  नहीं गए जाते है तो माता एक पैर से खड़ी रहती हैं .
  5. संभव हो सके तो माता के मंदिर भी जायें . 

माँ दुर्गा के ९ रूपों की पूजा का विधान नवरात्री में है,और माँ के ९ रूपों की व्याख्या इस प्रकार है  -----

  1. प्रथम हैं माँ शैलपुत्री ,हिमालय पुत्री होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा .
  2. नवरात्री के दुसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी   की पूजा का विधान है ,तप और जप करने के कारन इनका नाम ब्रह्मचारिणी पड़ा  .
  3. माँ चंद्रघंटा की पूजा नवरात्री की तीसरे दिन की जाती है ,इस रूप में माँ के मस्तक पर अर्धचन्द्र बना है अतः इस रूप को चंद्रघंटा कहते हैं .
  4. चतुर्थी को माँ कूष्मांडा की अर्चना का विधान है .ऐसा कहा जाता है मंद हंसी के द्वारा माँ ने ब्रम्हांड को उत्पन्न किया .इसलिए इन्हें कुष्मांडा  कहा जाता है 
  5. चार भुजाओं वाली माँ स्कंदमाता की अर्चना पंचमी को की जाती है .
  6. जिनकी उपासना से भक्तों के रोग ,शोक ,भय ,और संताप का विनाश होता है ऐसी माँ कात्यायनी की उपासना छठे दिन की जाती है .
  7. काल से रक्षा करने वाली देवी कालरात्रि की उपासना सातवें दिन की जाती है .
  8. शांत रूप वाली ,भक्तों को अमोघ फल देने वाली देवी महागौरी की पूजा आठवें दिन की जाती है .
  9. भक्तों की  समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली देवी सिध्दात्री की पूजा नवें दिन की जाती है .

 ऐसा माना जाता है की ,नवराति में माँ की आराधना करने में सबसे पहले माता के १ ० ८ नामों के पढना चाहिए ,जो इस तरह हैं ---------

  1. सती .
  2. साध्वी .
  3. भवप्रीता .
  4. भवानी  
  5. भवमोचनी .
  6. आर्या .
  7. दुर्गा .
  8. जया .
  9. आध्रा .
  10. त्रिनेत्रा .
  11. शूलधारिणी .
  12. पिनाकधारिणी .
  13. चित्रा .
  14. चंद्रघंटा .
  15. महातपाः .
  16. मनः .
  17. बुद्धिः .
  18. अहंकारा .
  19. चित्तरूपा .
  20. चित्ता 
  21. चितिः  
  22. सर्वमंत्रमयी .
  23. सत्ता .
  24. सत्यान्द्स्वरूपिनी .
  25. अनंता .
  26. भाविनी .
  27. भाव्या .
  28. भव्या .
  29. अभव्या .
  30. सदागति .
  31. शाम्भवी .
  32. देवमाता .
  33. चिंता .
  34. रत्नप्रिया .
  35. सर्वविद्या .
  36. दक्ष  कन्या 
  37. दक्ष यग्यविनाशिनी 
  38.  अपर्णा .
  39. अनेकवर्णा .
  40. पाटला .
  41. पाटलावती .
  42. पट्टाम्बर परिधाना .
  43. कल्मंजीर्रंजनी .
  44. अमेयविक्रमा .
  45. क्रूरा .
  46. सुंदरी .
  47. सुरसुन्दरी .
  48. वनदुर्गा .
  49. मातंगी .
  50. मतंग्मुनिपूजिता .
  51. ब्राह्मी .
  52. माहेश्वरी .
  53. ऐन्द्री .
  54. कौमारी .
  55. वैष्णवी .
  56. चामुंडा .
  57. वाराही .
  58. लक्ष्मी .
  59. पुरषा कृति  .
  60. विमला .
  61. उत्कार्शनी 
  62. ज्ञाना  .
  63. क्रिया .
  64. नित्या .
  65. बुद्धिदा .
  66. बहुला .
  67. बहुलप्रेमा 
  68. सर्ववाहन वाहना .
  69. निशुम्भ्शुम्भ्हन्नी .
  70. महिशाशुर मर्दिनी .
  71. मधुकैटभ हननी .
  72. चंड मुंड विनाशिनी .
  73. सर्व असुर विनाशा .
  74. सर्वदानव घातिनी .
  75. सर्वशात्र्मायी .
  76. सत्या .
  77. सर्वाशास्त्र्धरिणी .
  78. अनेकाश्त्र हस्ता  
  79. अनेकाश्त्र धारिणी .
  80. कुमारी .
  81. एक कन्या .
  82. कैशोरी .
  83. युवती .
  84. यति .
  85. अप्रोढ़ा .
  86. प्रोढा .
  87. वृद्ध माता .
  88. बलप्रदा .
  89. महोदरी .
  90. मुक्तकेशी .
  91. घोररूपा .
  92. महाबला .
  93. अग्निज्वाला .
  94. रौद्रमुखी .
  95. कालरात्रि .
  96. तपस्वनी .
  97. नारायणी .
  98. भद्रकाली .
  99. विष्णुमाया .
  100. जलोदरी .
  101. शिवदूती .
  102. कराली .
  103. अनंता .
  104. परमेश्वरी .
  105. कात्यायनी .
  106. सावित्री .
  107. प्रत्यक्षा .
  108. ब्रह्मवादिनी .
देवी के नामों का जो प्रतिदिन पाठ करता है उसके लिए तीनों लोकों में कुछ भी असाध्य नहीं है .
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अब  माता की सप्तसती मन्त्रों से पूजा अर्चना आरम्भ की जानी चाहिए ,जो इस प्रकार से है ----------



  1. देवी प्रप्न्नाति हरे प्रसीद प्रसीद मार्त जगतो अखिलस्य ,प्रसीद विश्वेश्वरी पाहि विश्वं त्वमीश्वरी चराचरस्य .
  1. सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके  ,शरण्ये त्रयम्बिके नारायणी नमोस्तुते । 
  1. देवी त्वं भक्तसुलभे सर्वकार्य विधायिनी ,कलोहि  कार्य सिद्धर्थ्य मुयाम ब्रूह यत्नतः .
  1. ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी  भगवती हि सा , बलादा कृष्य  मोहाय महामाया प्रयक्षति । 
  1. दुर्गे स्मरता हरसि भीतिमशेष  जन्तोः ,स्वस्थे स्मरता मतिमतीव शुभां ददासि । 
  1. दारिद्य दुःख भय हारिणी का त्वन्द्या ,सर्वोपकार करनाय सदार्द चिता । शरणागत दीनार्त परित्राण परायने ,सर्व्स्यार्ति हरे नारायणी नमोस्तुते । 
  1. सर्वस्वरूपे सेर्वेषे सर्वशक्ति समन्विते ,भयेभ्यस्त्राहि नो देवी दुर्गे नमॉस्तुते । 
  1.  रोगान शेशान  पहन्सि तुष्टा ,रुष्टा तू कामान सक्लांभिशितान । त्वं आश्रीतानाम न विपिन्नरानाम ,त्व्माश्रिता ह्याश्रिता प्रयन्ति  '
  1. सर्वबाधा प्रस्मनम त्रैलोकश्य अखिलेश्वरी ,एवमेव त्वया कार्यमस्द्वैरी  .विनाशं । 
            प्रतिदिन माँ दुर्गा के संक्षिप्त स्तुति सम्पूर्ण कार्य और मनोरथ पूर्ण करने वाली है ।  

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                      तत्पचात माँ का कीलक स्त्रोत का पाठ किया जाना चाहिए -------

महर्षि मार्कण्डेय जी बोले -----
कल्याण प्राप्ति हेतु निर्मल ज्ञानरूपी शरीर धारण करने वाले दिव्य नेत्रों वाले ,तथा मस्तक पर अर्धचन्द्र धारण करने वाले भगवन शिव जी! को नमस्कार है 
,इस धरा पर जो मनुष्य इस कीलक मन्त्र को जानने वाला है वाही कल्याण को प्राप्त करता है । जो केवल सप्तशती से ही देवी की स्तुति करता है उसे इस कीलक से देवी की सिद्धि हो जाती है ।देवि की सिद्धि  के लिए दूसरी साधना की आवश्यकता नहीं रह जाती ,लोगों के मन में आशंका थी की केवल सप्तशती   के मन्त्रों की उपासना अथवा अन्य मन्त्रों की उपासना से भी सामान रूप से सब कार्य सफल हो जाते हैं तो इनमें से कौन सा साधन श्रेष्ठ है । 
         इन सभी शंकाओं को लेकर भगवन शंकर ने अपने सामने आये भक्तों को समझते हुए कहा---- सप्तशती नामक सम्पूर्ण स्त्रोत कल्याण को देने वाला है और तभी भगवन शंकर ने माँ के सप्तशती नामक स्त्रोत को गुप्त कर दिया । इसलिए मनुष्य इसको बड़े पुण्य  से प्राप्त करता है । 
जो भी मनुष्य अष्टमी को या कृष्ण पक्ष की चतुर्दसी को देवी को अपना सर्वस्व  समर्पित कने के पश्चात् उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करता है ,उस पर माँ दुर्गा प्रसन्न हो जाती हैं,अन्यथा नहीं  । इस प्रकार शिव जी द्वारा इस स्त्रोत को कीलित किया गया है ,और जो पुरुष इस स्त्रोत को निश्कीलित करके नित्य प्रति पाठ करता है ,वह सिद्ध हो जाता है और वही गंधर्व होता है । 
इस संसार में सर्वत्र विचरते हुए भी उस मनुष्य को भय नहीं रहता म्रत्यु के पश्चात मोक्ष प्राप्त करता है । किन्तु इस कीलक की विधि को जानकार ही सप्तसती का पाठ करना चाहिए । कीलन  और निष्कीलन के ज्ञान के पश्चात यह स्त्रोत निर्दोष हो जाता है । ऐसा कहा जाता है , की स्त्रियों में जो सौभाग्यहैं ,इसी पाठ की कृपा स्वरूप हैं । 
         इस स्त्रोत का पाठ उच्च स्वर में करने से ही की जानी चाहिए । उस देवी की स्तुति अवश्य की जानी चाहिए जिसके प्रसाद स्वरूप सौभाग्य ,आरोग्य ,सम्पत्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है । 
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              इसके उपरांत अर्गला स्त्रोत का पाठ करना चाहिए जो इस प्रकार है --------------

जयंती ,मंगला ,काली ,भद्रकाली,कपालिनी ,दुर्गा ,क्षमा ,शिव,धात्री स्वाहा ,स्वधा इन रूपों में प्रसिद्ध माँ तुमको नमस्कार है ..

  1. सब जगह व्याप्त प्राणियों के दुःख हरने वाली माँ !कालरात्रि तुम्हें नमस्कार है ,मधुकैटभ का नाश करने वाली माँ ब्रह्मा जी को वर देने वाली माँ तुम मुझे रूप दो जय दो और काम क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करने वाली माँ तुमको मेरा नमस्कार है .। 
  2. महिषासुर मर्दिनी माँ! भक्तों को सुख देने वाली तुमको नमस्कार हो ,तुम मुझे रूप दो के दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो .। 
  3. रक्तबीज का वध करने वाली ,माँ !चंड मुंड विनाशिनी ,तुम मुझे रूप,जय दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो .। 
  4. शुम्भ-निशुम्भ का मर्दन करने वाली हे देवी! मुझको स्वरूप दो ,जय दो और मेरे काम,क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो .। 
  5. हे सम्पूर्ण सोभाग्य  को देने वाली !,पूजित युगल चरणों वाली माँ तुम मुझे रूप दो ,यश दो ,मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  6. तुम सब शत्रुओं का नाश करने वाली! हो ,तुम्हारे रूप और चरित्र अमित हैं ,मुझे रूप दो ,यश दो और काम क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो । 
  7. इस संसार में जो भक्ति से तुम्हारी पूजा करते हैं सबके पापों का नाश करने वाली माँ !तुम उन सबको रूप और यश दो और उनके शत्रुओं का नाश करो । 
  8. माँ रोगों का नाश करने वाली जो भी भक्त तुम्हारी पूजा भक्ति पूर्वक करते हैं उनको रूप और जय दो ,उनके शत्रुओं का नाश करो । 
  9.  हे देवी! माँ मुझे सोभाग्य और आरोग्य दो मुझे रूप दो जय दो और मेरे काम,क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो । 
  10. हे माँ ! जो मुझसे बैर रखते हैं उनका नाश करके मेरा बल बढाओ ,मुझे रूप,जय दो मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  11. माँ! मेरा कल्याण करके मुझे उत्तम सम्पत्ते प्रदान करो ,मुझे रूप दो जय दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो ।  
  12. देवताओ और राक्षसों के मुकुटों द्वारा स्पर्श किये चरणों वाली माँ !अम्बे मुझे स्वरूप ,जय दो ।  
  13. हे देवी! अपने भक्तों को विद्वान ,लक्ष्मीवान और कीर्तिमान बनाकर उन्हें रूप और जय दो ,उनके शत्रुओं का नाश करें । 
  14. हे देवी ! प्रचंड दैत्यों के मान का नाश करने वाली चण्डिके !मुझे रूप दो जय दो ,और मेरे काम क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो .
  15. हे माँ ! चार भुजाओं वाली परमेश्वरी !मुझे रूप ,जय दो मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  16. विष्णु से सदा स्तुति की हुई माँ ! हिमालय कन्या पारवती के भगवान् शंकर से स्तुति की गयी माँ ,मुझे रूप दो जय दो ,और मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  17. इंद्र द्वारा सद्भाव से पूजित माँ! तुम मुझे रूप दो जय दो और मेरे काम क्रोध रुपी शत्रुओं का नाश करो ।  
  18. प्रचंड ,भभुदंड से दैत्यों का दमन करने वाली माँ !मुझे रूप दो ,यश दो ,मेरे शत्रुओं का नाश करो । 
  19. हे देवी! तुम अपने भक्तों को असीम आनंद देने वाली हो ,मुझे रूप ,जय दो और मेरे शत्रुओं का नाश करो 
  20. मेरी इच्छानुसार  चलने वाली सुंदर पत्नी प्रदान करो ,माँ ! जो संसार सागर से तारने वाली हो और उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो .        

 जो मनुष्य इस महा स्त्रोत का पाठ करता है वह श्रेष्ठ फल प्राप्त करता है और प्रचुर धन भी प्राप्त करता है .

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दोस्तों में एक विशेष स्तुति माता की करती हूँ और आप सभी के साथ इसे बांटना चाहती हूँ ,माँ की ये स्तुति समस्त सुखों को  देने वाली है ------

   हे सिंघ्वहिनी  जगदम्बे तेरा ही एक सहारा है --------

  1. मेरी विपदाएं दूर करो ,करुणा की द्रष्टि  इस ओर करो । संकट के बीच घिरा हूँ माँ आशा से तुम्हें पुकारा है .
  2. कुमकुम ,अक्षत और पुष्पों से नैवेध धूप और अर्चन से । नित तुम्हें रिझाया करती हूँ क्यों अब तक नहीं निहारा है .
  3. जब-जब मानव पर कष्ट पड़े तब-तब तुमने अवतार लिया । हे कल्याणी ! हे रुद्राणी ,इन्द्राणी रूप तुम्हारा है .
  4. भाव -बाधाएं हरने वाली जन-जन की बाधाएं हरती हो । मेरी भी बाधाएं हरना जग जननी नाम तुम्हारा है .
  5. कौमारी ,सरस्वती हो तुम ,ब्रम्हाणी तुम वैष्णवी हो ।कर शंख चक्र और पुष्प लिए लक्ष्मी भी रूप तुम्हारा है .
  6. मधुकैटभ सा दानव मारा और चंड मुंड को चूर किया ।हे महेश्वरी ,महामाया चामुंडा रूप तुम्हारा है .
  7. धूम्रलोचन को तुमने मारा ,महिषासुर तुमने  संहारा है । हे सिंघ्वाहिनी !अष्टभुजी नवदुर्गा रूप रुम्हारा है .
  8. था शुम्भ-निशुम्भ असुर मारा और रक्तबीज का रक्त पिया । हे शिवदूती! हे गौरी माँ काली भी रूप तुम्हारा है .
  9. जब वैश्य -सुरथ ने तप करके अपना तन तुम्हें चढ़ाया था । दर्शन दे जीवनदान दिया ज्योतिर्मय रूप तुम्हारा है .
  10. तेरी शरणागत में आकर तेरी ही महिमा को गाकर ।माँ ! सप्तशती के मन्त्रों से भक्तों ने तुहें पुकारा है .

                  हे सिंघ्वाहिनी जगदम्बे तेरा ही एक सहारा है  ---------------------

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इस प्रकार से आप सभी नवरात्री की पूजा कि शरुआत करें



Tuesday, February 17, 2015

शिव भजन

अौघड़ वरदानी शिव जग विख्यात है ,झूठ नहीं बात है ये घूठ नहीं बात है -
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१. जंगल में घोर तप भस्मासुर ने किया,-
                                         होकर प्रसन्न उसे फौरन दर्शन दिया --
               कहा मांग वरदान कहे सकुचात है -झूठ नहीं बात है ये ----
२. भस्मासुर ने कहा जिसके सर कर धारण,
                                        फौरन हो जाये भस्म पूरी इच्छा करूँ,
           यही वर दीजे मुझे देखूं करामात है ,झूठ नहीं बात है ये-----
३. शिव ने वरदान दिया भस्मासुर खुश हुआ , 
                                        गिरिजा को देखकर मोहित असुर हुआ,
       शिव के साथ उसने किया शुरू उत्पात है ,झूठ नहीं बात है ये----
४. भागे ये भेद जान बाबा बम भोले नाथ,
                                     दौड़ा है भस्मासुर शिव के सर धरन हाथ ,
           आगे-आगे शिव पीछे पापी दौड़ा जात है ,झूठ नहीं बात है ये ---
५. शंकर की देख दशा दौड़ श्री सीतापति
                                      मार्ग में आये बन करके पार्वती ,
           कहा रुको कहाँ तुम दौड़े भागे जात  हो,झूठ नहीं बात है ये ----
६. पहले धरो शीश हाथ नाच करो मेरे साथ ,
                                    जैसे की नाचते है बाबा बम भोले नाथ ,
           चलने को तैयार मैं काहे घबरात है ,झूठ नहीं बात है ये -----
७ भस्मासुर ने जैसे ही सर कर धरा, 
                                 फौरन हो गया भस्म देर न लगी जरा ,
       चंचल प्रभु महिमा देख विश्व मुस्कुरात है,झूठ नहीं बात है ये ----

Saturday, January 17, 2015

bhajan /भजन

                            तेरा पल-पल बीता जाये ,मुख से जप लो नमः शिवाय
                                   ओम नमः शिवाय -ओम नमः शिवाय  
१. शिव-शिव तुम ह्रदय से बीजो,मन मंदिर का पर्दा खोलो-२
                           तेरा अवसर खाली  न जाये ,मुख से जप लो नमः शिवाय 
२. ये दुनिया पंक्षी का मेला समझो उड़ जाना है अकेला -२
                           तेरा तन-मन साथ न जाये,मुख  से जप लो नमः शिवाय
३. मुसाफिरी जब पूरी होगी,चलने की मजबूरी होगी -२    
                          पिंजरे प्राण रह जाये ,मुख से जप लो नमः शिवाय
४. शिव पूजन मस्त बने जा भक्ति रस पान किये जा -२ 
                         दर्शन विश्वनाथ के पय ,मुख से जप लो नमः शिवाय

Friday, January 9, 2015

भजन



भजन ---------

                        क्षण भंगुर जीवन की कलिका कल प्रात को जाने खिली न खिली      

१. मलयालम की शुचि -शीतलता - २ 

                          सुगंध समीर खिली न खिली ,,,,,,क्षण भंगुर जीवन की ---

२. काली कल कुठार लिए फिरता -२ 

                         तन मन से चोट झिली न झिली ----क्षण चंगुर जीवन की ---

३. कह ले हरी नाम अरी रसना -२ 

                       फिर अंत समय में हिली न हिली -----क्षण भंगुर जीवन की -------