Wednesday, December 14, 2016

भजन


                                             हो वंदना बारम्बार गुरुदेव आपके चरणों में,
                                             फिर कोटिन- कोटिन गुहार मेरी नमस्कार आपके चरणों में। 

१. प्रभु तुम्हरे आगे- पीछे को, और दाएं बाएं सकल दिशा, 
                                                 सुंदर चरणों में दंडवत  मेरी,  गुरुदेव आपके चरणों में । 

२. तुम्ह सकल ब्रम्हांड के नायक हो,  युग- युग में परमसहायक हो, 
                                                  जड़- चेतन जीव चराचर सब संसार आपके चरणों में । 

३. जब -जब भक्तों पर भीर पड़ी, पापों से दुखित हुई धरती, 
                                                  दुखी सुर नर मुनि जन की पहुंची जो पुकार आपके चरणों में। 

४. हर युग- युग भक्तों की रक्षा करी, नर रूप का धरी नयी भक्ति,
                                                  इस दास की भी भक्ति मुख को सरकार आपके चरणों में ।  

Monday, October 31, 2016

Bhai dooj (यम द्वितीया) 1 November 2016

Bhai dooj (यम द्वितीया) November 

भाई दूज या याम द्वितीया इस वर्ष १ नवम्बर २०१६ को पड़ रही है आइये जानते है की याम द्वितीया कब और कैसे मनाई जाती है-
भाई दूज दीपावली के दूसरे दिन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मनायी जाती है और इस दिन बहन अपने भाई को टीका करने के उपरांत ही खाना खाती है।

पौराणिक कथा -----

भाई दूज की पौराणिक कथा इस तरह से है ---- इसी दिन भगवान सूर्यदेव के पुत्र और यमपुरी के स्वामी यमराज अपनी बहन यमुना के द्वारा बार-बार निवेदन करने पर उसके घर आए थे और इस सुअवसर पर उनकी बहन यमुना ने भाव-विभोर होकर उनका भव्य स्वागत किया था. इस पर खुश होकर यमराज ने उन्हें वरदान दिया कि जो इस दिन यमुना में स्नान करके भाई-बहन के इस पवित्र पर्व को मनाएगा, वह मेरे भय से मुक्त हो जाएगा. इसी दिन से भाई-बहन के स्नेह को दर्शाने वाला यह त्यौहार प्रत्येक साल भाई दूज के रूप में मनाया जाने लगा. इस महापर्व को यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है. भाई बहन का यह पवित्र त्यौहार ब्रज सहित पुरे भारतवर्ष में धूमधाम से मनाया जाता है.

ऐसी मान्यता है कि जो भाई आज के दिन यमुना में स्नान करके पूरी श्रद्धा से बहनों के आतिथ्य को स्वीकार करते हैं उन्हें तथा उनकी बहन को यम का भय नहीं रहता।


भाई दूज की एक कथा इस प्रकार से है ------ 

                      एक भाई -बहन प्रेम पूर्वक रहते थे और हर वर्ष भाई दूज का पर्व पूरी श्रद्धा से करते थे। बहन के विवाह के पश्चात् उसके पति ने भाई दूज के लिए उसे मायके जाने और भाई दूज करने से तो मना कर ही दिया, साथ ही अपने कार्य पर जाने से पूर्व घर के द्वार पर ताला भी लगा दिया ताकि उसका भाई आकर टीका न करा सके। इस दिन बहन अपने भाई की रक्षा के लिए घर के आंगन में चौक पूर (रंगोली रख ) कर पूजन करने के पश्चात् भाई को टीका करती हैं तो ,बहन भी चौक पूजने के बाद रोली को घोल रही थी, तभी नाली के रास्ते से एक कुत्ता आ गया उसे भागने के लिए जैसे ही उस बहन ने हाथ मारा उसके हाथ की रोली उस कुत्ते के मस्तक पर लग गयी। कार्यालय में जब उस बहन के पति ने भाई के मस्तक पर टीका देखा।  घर पहुँच कर अपनी पत्नी पर गुस्सा करने लगा और पुछा जब मैं बाहर ताला लगा कर गया था तो तुमने अपने भाई को टीका कैसे किया . 

तब उसने बताया मैं कैसे अपने भाई को टीका करती मैं तो कहीं भी गयी ही नहीं हाँ एक कुत्ता अवश्य नाली के रास्ते से अंदर आ गया था और उसे भागने के लिए मैंने जब मारा तो मेरा हाथ जरूर लग गया। तब पति को अपनी गलती का पश्चाताप हुआ और तबसे उसने अपनी पत्नी को इस पर्व को मानाने से नहीं रोका।  

Tuesday, September 20, 2016

भजन


                                  गुरु पास रहे या दूर रहे नज़रों में समाये रहते हैं


 १. जीवन की घड़ियाँ छोटी हैं, दुनिया की मंजिल लंबी है -२
                              छोड़ो गुरु पर जिम्मेवारी, गुरु आप सम्हाले रहते है --
 २. सुख में भी आप नज़र आते, दुःख में भी धीरज बंधवाते-२
                               दुःख- सुख समझो एक सामान गुरु याद दिलाते रहते है
 ३. जिस अंश के हम सब प्राणी हैं उस अंध के है सारे प्राणी -२
                             माया में फंस कर भूल गए गुरु याद दिलाते रहते है ।। 

Wednesday, September 14, 2016

भजन


                             दो दिन का जग में मेला सब चला चली का ठेला
१. कोई चला गया कोई जाने, कोई गठरी बाँध सिंघाने -२
                                   कोई खड़ा तैयार अकेला-  सब चला चली का मेला-----
२. कर पाप कपट छल  माया,  धन लाख करोड़ कमाया -
                                   संग चले न एक अधेला - सब चला चली का मेला ----
३. सुत  नार मात  पिता भाई,  अंत सहायक नाहीं---२
                                   क्यों भरे पाप का थैला - सब चला चली का मेला ---
४. यह नश्वर सब संसारा, कर भजन ईस का प्यारा --
                                ब्रह्मानंद  कहें सुन चेला - सब चला चली का मेला 

Monday, September 5, 2016

भजन


                   
                          ओ दुनिया वालों दमन फैला लो मेरी दुर्गे मैया चली आ रही हैं,
                          चली आ रही है, चली आ रही है पहाड़ों से मैया चली आ रही है।

१. दुष्टों को मारा मैया तुमने संहारा, दिया मान भक्तों को तुमने सहारा-२
                            भक्तों के संकट मिटाने वाली माँ अमृत बहाती चली आ रही है--

२. अंधे को नैना, कोढ़ी को काया, बाँझिन को पुत्र मैया निर्धन को माया-२
                         लूट लो जितना लूट ही जाये खजाना लुटाती चली आ रही है -

३.ऐ  शेरा वाली तेरा सहारा, तू जननी में हूँ बालक तुम्हारा -
                         शेरों की सवारी लगती है प्यारी झूमती  रही है ॥   

Thursday, September 1, 2016

भजन


         

                      बन के लिल्हारी राधा को छलने चले, वेष उनका बनाना गजब हो गया,
                      जुल्म ढाती थीं जो चोटियां श्याम की, मांग सेन्दुरा भराना गजब हो गया --


१. आसमान पर सितारे लरजने लगे, चाँद बदली में मुंह को छिपाने लगा,
                  चांदनी रात में बेखबर बाम पर, बेनकाब उनका आना गजब हो गया ---

२. बिछड़ी जिस दम मिली थी नज़र से नज़र, जान राधा गयीं छल किया आन कर,
                   बहुत शर्मिंदा थीं राधिका उस घड़ी, श्याम का मुस्कुराना गजब हो गया-

३. हाथ गालों पे जिस दम धरा श्याम ने, हाथ झलककर के राधा ये कहने लगीं,
                  सच बता दे अरे छलिया तू कौन है, तुमसे नज़रें मिलाना गजब हो गया-

४. तेरा प्रेमी हूँ अच्छी तरह जान ले, मैं हूँ छलिया किशन मुझको पहचान  ले,
                तेरी खातिर मैं राधा जनाना बना, प्रेम तुमसे बढ़ाना गजब हो गया ----

Wednesday, June 29, 2016

भजन



तेरा पल -पल बीता जाए मुख से जप लो नमः शिवाय, ओम नमः शिवाय ओम नमः शिवाय -

१. शिव- शिव तुम ह्रदय से बोलो, मन मंदिर का पर्दा खोलो -२
                             तेरा अवसर खाली न जाये, मुख से जप लो नमः शिवाय ----

२. ये दुनिया पंक्षी का मेला, समझो उड़ जायेगा अकेला -२
                           तेरा तन मन साथ न जाये, मुख से जप लो नमः शिवाय -----

३.मुसाफिरी जब पूरी होगी, चलने की मजबूरी होगी -२
                        पिंजरा प्राण रह जाये, मुख से जप लो नमः शिवाय ----

४. शिव पूजन मस्त बने जा, भक्ति सुधा रस पान किये जा -२
                      दर्शन विश्व्नाथ के पाये, मुख से जप लो नमः शिवाय ------------

Saturday, June 25, 2016

भजन




गोविन्द गा ले गोपाल गा, जीवन की नैया किनारे लगा ले --
१. दुनिया के साथी सबसे निराले, 
                      बाहर से उजले अंदर से काले, गोविन्द ------
२. भाई सम्हाले, न बेटा सम्हाले, 
                    एक दिन करेंगे ये यम के हवाले, गोविन्द 
३. संग चलेंगे न महल अटारी , 
                    मरने के पीछे निकाले अकेले, गोविन्द ----
४. पागल अभागा गफ़लत न जाने,
                   एक दिन पड़ेगा अग्नि के पाले, गोविन्द -------

Monday, June 20, 2016

bhajan






नटवर नागर नंदा भजो रे मन गोविंदा -
१. तू ही नटवर, तू ही नागर, तू ही बाल मुकुंदा -
                    भजो रे मन गोविंदा
२.सब देवन में कृष्ण बड़े हैं, ज्यूँ तारा विच चन्दा --
                   भजो रे मन गोविंदा ----
३. सब सखियन में राधा जी बड़ी हैं, ज्यूँ नदिया विच गंगा -
                  भजो रे मन गोविंदा ----
४. ध्रुव तारे प्रह्लाद उबारे, नरसिंह रूप धरन्ता -
                 भजो रे मन गोविंदा -------
५.कालीदह में नाग जो नाथो, फर्ण फर्ण करत निरन्ता --
                  भजो रे मन गोविंदा ------
६. वृंदावन में रास रचायो, नाचत बाल मुकुंदा ----
                  भजो रे मन गोविंदा ---
७. मीरा के प्रभु गिरधर नागर, काटो जम का फंदा -
                भजो रे मन गोविंदा ----

Thursday, June 16, 2016

bhajan

                  न जाने कौन से गुण पर दयानिधि रीझ जाते हैं -----
                   हर भक्त कहते हैं, यही सद्ग्रन्थ गाते हैं ---

१. नहीं स्वीकार करते है निमंत्रण नृप द्रुयोधन का,
                                        विदुर के घर पहुंचकर भोग छिलकों का लगाते हैं -----

२. न आये मधुपुरी से गोपियों की दुःख कथा सुनकर,
                                       द्रुपद जां की दशा पर द्वारिका से दौड़े आते हैं------

३. न रोये वन गमन में श्री पिता की वेदनाओं पर,
                                      उठाकर गीध को निज गोद में आँसू बहते हैं ---

४. कठिनता से चरण धोकर मिले कुछ बिंदु विधि हरी को,
                                    चरणोदक स्वयं केवट घर जाकर लुटाते हैं ---------

Thursday, May 19, 2016

भजन







बंसी बजाने वाले बंसी की धुन सुनाना, बंसी की धुन सुनाना,
जीवन मेरा अँधेरा तुम ज्योत बनके आना, तुम ज्योत बन के आना -

१. कोई नहीं हमारा नैया का है खिवैया -२ 
               तेरे सिवा कन्हैया मेरा कहाँ ठिकाना, मेरा कहाँ ठिकाना 

२. अज्ञानता हमारी प्रभुजी ये दूर करना -२ 
              गीता सुना के अपना प्रेमी मुझे बनाना, प्रेमी मुझे बनाना  ॥  

Friday, May 13, 2016

माँ वैष्णो देवी यादगार यात्रा

                              यहाँ मैं यह बताना चाहूंगी की सभी चित्र मैंने गूगल से लिए हैं -

हर कोई अपने जीवन में कभी घूमने की जगह पर या फिर कभी धार्मिक स्थल पर भ्रमण के लिए अवश्य जाता है वहां से कुछ यादगार पल अपने मन में समेत कर लाता है ।
मैंने भी इस तरह की कई यात्राएं की हैं पर सबसे यादगार और खुशनुमा यात्रा के बारे में कहना चाहूंगी की पिछले वर्ष की माँ वैष्णो देवी की यात्रा हमारे लिए सच में बहुत ही यादगार रही ।
इससे पहले हम जब माँ के दर्शनार्थ गए तब जम्मू से कटरा तक कोई ट्रेन नहीं जाती थी, तो या तो टैक्सी या फिर बस के द्वारा कटरा तक का सफर करना होता था , फिर वहां से आगे  के लिए पैदल, टट्टू, या खच्चर के द्वारा माँ के दरबार में पहुंचा जाता है ।
                                                            जम्मू से कटरा की ट्रेन
                                                             जम्मू से कटरा

पर अब जम्मू से कटरा के लिए ट्रेन भी जाने लगी तो हमने इसी सुविधा का प्रयोग किया । हम सभी परिवार जन जुलाई के दुसरे माह में गए थे तब वहां का मौसम खुशनुमा तो होता ही है पर बारिश का मौसम भी होता है ।
हम ट्रेन से दिल्ली से जम्मू के लिए रवाना हुए, दिल्ली से जम्मू का सफर लगभग ६०० किलोमीटर का है जिसमें लगभग १० घंटे लग जाते है ।
दिल्ली से जम्मू तक की यात्रा के लिए ट्रेन का किराया ३०० से २३०० तक लग जाता है ।
परिवार के लोगों का साथ होने से सफर लुत्फ़ उठाते हुए बीतता है यह तो आप सभी को मालूम ही है ।
 हम सुबह करीब १० बजे करीब जम्मू पहुँच गए, थोड़ा रुक कर कुछ खा पीकर हम  वहां से ट्रेन से जम्मू के लिए रवाना हुए,  जम्मू से कटरा का सफर इतना आनंददायक था की उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकती । ट्रेन कभी पहाड़ों के बीच से कभी गुफाओं के बीच से और कभी पुल से गुजर रही थी जब पहाड़ों के बीच से गुजरती तो पहाड़ों से रिस्ता हुआ ठन्डे पानी की छीटें तन को सिहरा देतीं, जब खायी से गुजरती तब मन में थोड़ा सा कम्पन होता और जब पहाड़ों के साथ चलते हुए निकलती तो और  लगता, कुल मिलाकर ट्रेन का सफर बड़ा ही  आनंददायी था । लगभग ४ बजे हम कटरा पहुँच गए थे
अब हम श्राइन बोर्ड के होटल में थे जिसमें साफ़ सफाई का बड़ा ही ध्यान दिया गया था , हम १० लोग थे तो रूम में १० बेड  और उनपर साफ़ चादरें बिछीं थीं । आप इन सबके लिए ऑनलाइन बुकिंग कराकर जाएं तो बेहतर होगा अन्यथा वहां जाकर इन सब में काफी समय निकल जाता है ।  वहां थोड़ा आराम जरने के उपरांत हमने खाना खाया ।
फिर हम सभी ऑटो से उस स्थान  तक पहुंचे जहाँ से यात्रा आरम्भ होती है - दरबार में जाने के लिए कुछ लोग पालकी, या हेलीकॉप्टर से भी जाते हैं.

                                                              पैदल यात्रा का मार्ग

खैर, अब शुरू हुई हमारी असली यात्रा यानि माँ वैष्णो के भवन के लिए चढ़ाई, हमने तय किया की हम पैदल ही माँ के भवन तक का मार्ग तय करेंगे तो रात्रि का सफर ऐसे में उत्तम रहता है, हम शाम के ७ बजे चढ़ाई के लिए रवाना हुए , जय माता दी, जय माता दी न केवल हम सब अपितु मार्ग में चलने वाले सभी यात्री भी जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे थे।
रात्रि के १ बजे के करीब हम अर्द्धकुमारी पहुंचे और तभी बारिश होने लगी और बारिश भी ऐसी की आगे बढ़ने के लिए सोच में पड़ गए तो हमने वहां २ घंटे का विश्राम लिया और फिर आगे की यात्रा आरम्भ की। प्रातः की किरणें धीरे -धीरे पांव पसारने लगी थीं परन्तु बारिश और घने कोहरे ने सूर्य नारायण के उजाले पर ग्रहण लगा रखा था ।

                                                      कहीं कहीं तो इतनी अधिक बारिश हो रही थी की मार्ग में आगे बढ़ने के लिए सोचना पड़ रहा था फिर भी हम सब हिम्म्त से चलते रहे । एक दो बार तो ऐसा लग रहा था की राह में बारिश के साथ पत्थर की बड़ी शिला भी गिर पड़ेगी हम सभी ने हिम्म्त नहीं हारी और चलते ही गए और फिर हमारे सामने पवित्र भवन की झलक दिखने लगी दिल में उमंग और ख़ुशी दोनों का ऐसा मिलन हो रहा था की कैसे बताऊँ । बादलों की बीच माँ का भवन ऐसा लग रहा था मानों बस स्वर्ग यहीं है ।
यहाँ हमने अपना सामान रखवाया और दशर्न की पर्ची पर मोहर लगवाकर स्नान करने के लिए गए और फिर दर्शनर्थ के लिए लाइन में लगे धीरे- धीरे हम माँ की पवित्र गुफा की ओर बढ़ रहे थे और फिर वो समय आया जब हम माँ के दरबार में थे , नतमस्तक हो माँ के आगे झुकते ही आंसुओं की लड़ी लग गयी , जो मेरे साथ अक्सर होता है खुद की माँ न होने के कारण माँ दुर्गा के हर स्वरूप को मैंने अपनी माँ माना है इसलिए माँ के सामने झुकते ही ख़ुशी के आंसूं निकल ही आते हैं ।
 अधिक देर रुकने की अनुमति नहीं है पर जिस समय हम दर्शन के लिए गए थे अधिक बारिश के चलते भीड़ नहीं थी तो हम आराम से माँ के दर्शन कर पाए और बाहर आये यह हमारा सौभाग्य था की उसी समय किसी ने अपनी मन्नत पूरी होने पर प्रसाद चढ़ाया था जो हमें भी मिला।
इतनी देर के लिए हम गुफा के बाहर पहले नहीं रुक पाए थे जितनी देर के लिए इस बार रुके थे बहार का नज़ारा बस देखते ही बन रहा था हर तरफ काली घटाएं और बीच में माँ की सफ़ेद उज्ज्वल गुफा के द्वार ।
 वहां से वापस आकर भोजन ग्रहण किया और फिर नीचे उतरने के लिए प्रस्थान किया, अत्यधिक बारिश के कारन हम भैरों जी के दर्शन हेतु नहीं जा सके । पर हाँ नीचे से ही उनके मंदिर के दर्शन हुए यह भी मेरे लिए यादगार पल रहा ।
हम सभी काफी थक गए थे इस कारण हमने अर्द्धकुमारी तक का मार्ग टैम्पो से तय किया और वह से पैदल , नीचे आने के बाद माँ के पहाड़ों के दर्शन भी कुछ कम मनोरम नहीं था -
                                                               रात्रि का नज़ारा

आप यदि माँ वैष्णो देवी के दर्शन के लिए जाना चाहते हैं तो आपको इस लिंक पर सारी सूचनाएं मिल जाएँगी -

http://www.indianrail.gov.in/

हेलीकॉप्टर की बुकिंग के लिए इस वेबसाइट पर सूचना प्राप्त कर सकते हैं -

 http://www.jammu.com/shri-mata-vaishno-devi-yatra/online-helicopter-booking.php

                                                               




Thursday, May 12, 2016

मोहिनी एकादशी

आने वाली 17 मई को मोहिनी एकादशी है ,जो की बैशाख माह के शुक्लपक्ष को होती है और इस वर्ष ये एकादशी 17 मई को पड़  रही है ।
 हर एकादशी का अपना अलग महत्व है ,कहा गया है की इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से निन्दित कर्मों से छुटकारा मिल जाता है ।
इस दिन पुरषोत्तम राम की पूजा का विधान है ,भगवन राम की प्रतिमा को स्नानादि से शुद्ध करने के पश्चात उच्चासन पर विराजमान करने के बाद धूप  ,दीप एवम मीठे फलों से पूजन किया जाना चाहिए .। रात्रि में कीर्तन करते हुए मूर्ति  के समीप ही शयन करना चाहिए ,और फिर प्रातः काल में स्नानादि से निवृत होकर दान करें और फिर अन्न ग्रहण करना चाहिए ।
 इस एकादशी का महत्तम राजा  राम ने महर्षि वशिष्ठ से पूछा था ,वशिष्ठ जी ने कहा ----सरस्वती नदी के तट पर चन्द्रावती नाम की नगरी है ,उसमें धृत राजा राज्य करता था  । एक धनपाल नाम का वैश्य  रहता था ,बड़ा ही धर्मात्मा और विष्णु का भक्त था । उसके पांच पुत्र थे, बड़ा पुत्र महापापी था । जुआ खेलता ,मद्धपान  करना नीच कर्म करने वाला था । उसके माता, पिता ने कुछ धन देकर उसे घर से निकाल दिया । आभूषणों को बेचकर कुछ दिन उसने काटे ,अंत में धनहीन हो गया और चोरी करने चला ,पुलिस ने पकड़ कर बंद कर दिया । दंड की अवधि व्यतीत हुई तो नगरी से निकाला गया , वन में पशु -पक्षियों को मारता -खाता समय व्यतीत करने लगा ।
एक दिन उसके हाथ शिकार न लगा ,भूखा- प्यासा कोठर मुनि के आश्रम पर आया ,हाथ जोड़कर बोला मैं आपकी शरण में  हूँ ,पातकी हूँ ,कोई उपाय बताकर मेरा उद्धार करें ?
मुनि बोले वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी का एक व्रत करो ,अन्नत जन्मों के पाप भस्म हो जायेंगे । मुनि की शिक्षा से वेश्य कुमार ने मोहिनी एकादशी का व्रत किया । वह पापरहित होकर विष्णु लोक को चला गया .

इसका महात्म्य सुनने  से हजार  गायों के दान का फल मिलता है ।  

इस दिन गाय के मूत्र का सागार लेना चाहिए । 

एकादशी के व्रत का पुराणों में बहुत महत्व बताया गया है यदि व्रत न रह सकें तो इसकी कथा सुनने मात्र से भी पुण्य प्राप्त होता है। 

Thursday, March 3, 2016

विजया एकादशी दिनांक ५ मार्च २०१५

फाल्गुण मास के कृष्ण पक्ष की एकाद्शी को विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है. एकादशी व्रत करने से व्यक्ति के शुभ फलों में वृ्द्धि होती है।

इस वर्ष यह एकादशी दिनांक ५ मार्च २०१५ को पड़  रही है, यह सब व्रतों से उत्तम व्रत है।एक समय देवर्षि नारदजी ने जगत् पिता ब्रह्माजी से कहा महाराज! आप मुझसे फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी विधान को जानने की इच्छा रखते हुए इस एकादशी के बारे में विस्तार से बताने का आग्रह किया। 
 ब्रह्माजी कहने लगे कि हे नारद! विजया एकादशी का व्रत पुराने तथा नए पापों को नाश करने वाला है। यह समस्त मनुष्यों को विजय प्रदान करती है।

 इस व्रत की कथा इस प्रकार है--

 त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्रजी को जब चौदह वर्ष का वनवास हो गया, तब वे श्री लक्ष्मण तथा सीताजी ‍सहित पंचवटी में निवास करने लगे। वहाँ पर दुष्ट रावण ने जब सीताजी का हरण ‍कर लिया है, इस समाचार से अत्यंत व्याकुल हो वे लक्ष्मण सहित सीताजी की खोज में चल पड़े।  
 घूमते-घूमते जब वे उस जगह पहुंचे जहाँ रावण से सीताजी को बचाते हुए जटायु घायल अवस्था में पड़े हुए थे, जटायु उन्हें सीताजी का वृत्तांत सुनाकर स्वर्गलोक चला गया। कुछ आगे जाकर उनकी सुग्रीव से मित्रता हुई और बाली का वध किया। हनुमानजी ने लंका में जाकर सीताजी का पता लगाया और उनसे श्री रामचंद्रजी और सुग्रीव की‍ मित्रता का वर्णन किया। वहाँ से लौटकर ह जब श्री रामचंद्रजी समुद्र से किनारे पहुँचे तब  उस अगाध समुद्र को देखकर लक्ष्मणजी से कहा कि इस समुद्र को हम किस प्रकार से पार करेंगे। इस पर भगवान श्री राम ने समुद्र देवता से मार्ग देने की प्रार्थना की. परन्तु समुद्र ने जब श्री राम को लंका जाने का मार्ग नहीं दिया तो भगवान श्री राम ने ऋषि गणों से इसका उपाय पूछा. ऋषियों में भगवान राम को बताया की प्रत्येक शुभ कार्य को शुरु करने से पहले व्रत और अनुष्ठान कार्य करने से कार्यसिद्धि की प्राप्ति होती है. और सभी कार्य सफल होते है. हे भगवान आप भी फाल्गुण मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत विधिपूर्वक किजिए.
भगवान श्री राम ने ऋषियों के कहे अनुसार व्रत किया और इसके प्रभाव से दैत्यों पर विजय पाई। 
किसी भी व्रत पूजन को पूर्ण विधि- विधान से करने से समस्त कार्यों की सिद्धि होती है।